रस गगन गुफा में अजर झरै

रस गगन गुफा में अजर झरै

रस गगन गुफा में अजर झरै।

बिनु बाजा झनकार उठै जहँ समुझि परै जब ध्यान धरे।।

रस गगन…..

बिना ताल जहँ कँवल फुलाने, तेहि चढ़ि हंसा केलि करै।

बिन चन्दा उजियारी दरसे जहँ तहँ हंसा नजर परै।।

रस गगन…..

दसवें द्वारे तारी लागी, अलख पुरुष जाको ध्यान धरै।

जुगन जुगन की तृषा बुझानी, करम भरम अघ व्याधि टरै।।

रस गगन…..

काल कराल निकट नहिं आवै, काम-क्रोध-मद-लोभ जरै।

कहै कबीर सुनो भाई साधो, अमर होय कबहूँ मरै।।

रस गगन…..

कबीर का यह पद बड़े काम का है। लोग भजन करते हैं तो कहते हैं– आनन्द नहीं आता है, भजन से कुछ मिलते दीखता नहीं है, मन नहीं लगता। सन्त महापुरुष कहते हैं कि भगवान के रास्ते में अनन्त सुख है, लेकिन यहाँ तो दु:ख ही दु:ख है। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। सन्त कबीर आरम्भिक साधकों की इस समस्या से अवगत हैं। वह आश्वासन देते हैं कि भजन में आनन्द मिलेगा लेकिन साधना की एक सीढ़ी, एक निश्चित दूरी तय कर लेने के पश्चात्! यह दूरी तय होती है नाम-जप से, सद्गुरु की सेवा से। श्रद्धापूर्वक इन्हें करने से भजन जागृत हो उठता है और भजन जागृत होते ही साधक में ब्रह्म-पीयूष का संचार शुरू हो जाता है, जिसके लिए उन्होंने कहा–

रस गगन गुफा में अजर झरै।

गगन गुफा में रस की अजस्र वर्षा होती रहती है। आध्यात्मिक परिवेश में एक ओर संसाररूपी समुद्र है जिसमें विषयरूपी जल भरा हुआ है, तो दूसरी ओर भगवान भी आनन्द-सिन्धु हैं। गोस्वामीजी के शब्दों में–

आनँद-सिंधु मध्य तव बासा।

बिनु जाने कस मरसि पियासा।।

मृग-भ्रम-बारि सत्य जिय जानी।

तहँ तू मगन भयो सुख मानी।। (विनयपत्रिका, १३६)

कदाचित् आनन्द का यह स्रोत प्राप्त हो जाय तो यह मनरूपी मृग विषय-वारिरूपी मृगतृष्णा में क्यों दौड़ेगा? इसी अमृत-रस के लिये संत कबीर प्रोत्साहित करते हैं–

बिना पियाला अमृत अचवै नदी नीर भरि राखै।

कह कबीर सो जुग-जुग जीवे राम सुधा रस चाखै।

सन्तो! जागत नींद कीजै।।

कबीर कहते हैं– यह राम सुधा रस’– ब्रह्म-पीयूष गगन गुफा में अजर झरै’– गगन गुफा से निरन्तर गिरता रहता है। गगन कहते हैं आकाश को, शून्य या पोल को। अध्यात्म में आकाश का आशय है जब मन संकल्प-विकल्परहित, शून्यवत् हो जाय, संस्कारों की भीड़ कम हो जाय। इस शहर में लाखों लोगों की भीड़ है किन्तु आपके मन में उससे भी अधिक संकल्पों की भीड़ है, लहर है, ताँता लगा है। यह भीड़ शान्त हो जाय, मन संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में टिकने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, उस क्षण वह आकाश के कोने में उसकी कन्दरा में प्रवेश पा गया। मन अभी आकाशवत् निर्लेप तो नहीं हुआ लेकिन आकाश के एक कोने में गगन-गुफा में प्रवेश पा गया। न भीतर से संकल्पों का अभ्युदय हो और न वाह्य वायुमण्डल के संकल्प ही मन ग्रहण करे, जहाँ चिन्तन करते-करते यह अवस्था आयी, चित्त संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में स्थिर हुआ तत्क्षण ब्रह्मपीयूष का संचार मिल जाता है। यह एक बार जागृत हो गया तो अजस्र प्रवाहित रहता है, उसका क्रम कभी नहीं टूटता। संसार के अधिकांश झरने बरसात में प्रवाहित हो जाते हैं किन्तु ग्रीष्म ऋतु में सूख जाते हैं। यह गगन गुफा का स्रोत अजस्र, अनवरत, अविरल प्रवाहित रहता है, इसका क्रम कभी टूटता ही नहीं। आप सो जायँ किन्तु आपके भीतर वह झरना चलता रहेगा। इस झरने की एक विशेषता और भी है–

बिन बाजा झनकार उठै जहँ’

उस गगन गुफा में बिना किसी वाद्य के एक झनकार उठा करती है किन्तु समुझि परै जब ध्यान धरै।’– वह झनकार तभी समझ में आयेगी जब आप ध्यान धरने लगें। ध्यान धरते-धरते चित्त शून्य में टिकने की क्षमता पा जाता है। इसके साथ ही रिनक-धिनक धुन अपने से उठने लगती है। एक बार नाम में सूरत लगा भर दें तो ओम्-ओम्-ओम् की एक धुन प्रवाहित हो जाती है। भजन अनिवार्य है, करने से ही यह समझ में आता है। उस गगन गुफा में और कैसा दृश्य है?

बिना ताल जहँ कँवल फुलाने’

बिना सरोवर के वहाँ कमल खिलते हैं। कमल कीचड़ में उत्पन्न होता है इसलिए इसे पंकज भी कहते हैं। यह जल में रहता है। बार-बार पानी की लहरें इसके ऊपर से आती-जाती हैं फिर भी कमल के पत्र और पंखुड़ी पर जल नहीं ठहरता, इसे गीला नहीं कर पाता। कीचड़ में रहते हुए भी उससे निर्लेप रहता है। महापुरुषों ने साधक के संयत चित्त की तुलना कमल से की है। गीता में है– पद्मपत्रमिवाम्भसा’ (५/१०)। नाथ-पंथ से अनुप्राणित योग-ग्रन्थों में शरीर के भीतर मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार के रूप में चक्रों की मान्यता है जहाँ क्रमश: चार, छ:, दस, बारह, सोलह, दो तथा सहस्र पंखुड़ियोंवाले कमल के ऊर्ध्वमुखी खिलने की बात कही जाती है जो सब-के-सब योग के रूपक हैं, चित्त को अन्तर्मुखी करने के प्रयास मात्र हैं।

उदाहरण के लिए मेरुदण्ड के नीचे मूलाधार में चतुर्दल कमल की मान्यता है। यह चार दल अन्त:करण चतुष्टय– मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का प्रतीक है। पहले इस स्थल पर स्थित कमल की पँखुड़ियाँ अधोमुखी रहती हैं, विषयोन्मुख प्रवाहित हैं। साधना के द्वारा सिमटकर यह चारों ऊर्ध्वमुखी हो जायँ, इष्टोन्मुखी प्रवाहित हो जायँ– यही इस चतुर्दल कमल का खिलना है, इसकी पंखुड़ियों का ऊर्ध्वमुखी हो जाना है। जब इनका मुख नीचे की ओर था, यह मल में थीं; अब इष्ट की ओर होने से निर्मल हो गयीं। साधक अभी यद्यपि संसार में ही है किन्तु उसमें संसार से अलिप्त रहने की क्षमता आ गयी। यहीं से भजन आरम्भ होता है इसलिए इसे मूलबंध भी कहा जाता है।

मूलाधार से उन्नत अवस्था में स्वाधिष्ठान चक्र है। स्व का अर्थ है आप स्वयं और अधिष्ठान का अर्थ है निवास अर्थात् अपने स्वरूप के प्रति आस्था सुदृढ़ हो गयी। उस समय अधोमुखी षट्दल– षट्विकार– काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मत्सर हैं। ऊर्ध्वमुखी होने पर यही षडैश्वर्य– विवेक, वैराग्य, शम, दम, तप और तितिक्षा में परिणित हो जाते हैं। यही कमल का खिलना है। इससे उन्नत अवस्था में मणिपूर में दस दल कमल ऊर्ध्वमुखी होकर खिल जाता है, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ इष्टोन्मुखी हो जाती हैं, उस समय श्वास में उठनेवाला एक-एक नाम मणि की संज्ञा पा जाता है। कुछेक की मान्यता है कि मणिपूर में कमल अष्टदल का है अर्थात् अष्टधा मूल प्रकृति अष्टसिद्धि में परिणत हो जाती है। इससे उन्नत अनाहत चक्र में द्वादश दल के कमल के ऊर्ध्वमुखी होकर खिलने की अवस्था आती है अर्थात् दसों इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयत हो जाते हैं। विशुद्ध चक्र में सोलह दल का कमल है। पंचमहाभूतों से निर्मित स्थूल शरीर के भीतर सोलह उपादानों से निर्मित सूक्ष्म शरीर, जिसमें दस इन्द्रियाँ, चार अन्त:करण, तैजस और प्राज्ञ आते हैं, इनमें ईश्वरीय आभा प्रस्फुटित हो जाती है; सूक्ष्म शरीर भी विशुद्ध हो जाता है, साधक सख्यभाव को प्राप्त कर लेता है जहाँ कमल में केवल दो दल रह जाते हैं अर्थात् इस स्तर पर स्वामी और सेवक केवल दो आमने-सामने रह जाते हैं। अन्त में सहस्रार में सहस्र या अनन्त पंखुरियोंवाला कमल ऊर्ध्वमुखी हो खिल उठता है, चित्त की अनन्त वृत्तियों में से एक भी अधोमुखी नहीं रह जातीं। ऐसे सेवक को परमात्मा अपना लेते हैं, उस तन को अपना निवास बना लेते हैं। सन्तों ने चक्रभेदन की अपेक्षा भक्ति पर ही बल दिया जिसमें यह अवस्थायें स्वत: तथा सहज ही प्राप्त हो जाती हैं, मन के निरोध के साथ भगवान में स्थिति मिल जाती है। ये भिन्न-भिन्न दलोंवाले कमल यौगिक रूपक हैं, जहाँ तालाब तो नहीं है किन्तु कमल खिलते हैं।

तहँ चढ़ि हंसा केलि करे।’ इस ऊँचाई पर पहुँचकर हंस क्रीड़ा करने लगता है। गोस्वामी तुलसीदास संत की तुलना हंस से करते हैं–

संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार। (रामचरितमानस, १/६)

विषय-विकाररूपी वारि का त्याग कर ईश्वरीय गुणरूपी दूध ही जिनका जीवन हो गया हो, वे सन्त हंस कहलाते हैं। मछली को जल से बाहर निकाल कर रखें; क्या वह जीवित रह सकेगी? इसी प्रकार हंस वे सन्त हैं। ईश्वरीय गुण के विपरीत वह जीवन धारण नहीं रख सकते। दूसरे शब्दों में जब सारे कमल, सभी वृत्तियाँ इष्टोन्मुखी विकसित हो गयीं, ‘तहँ चढ़ि हंसा केलि करे’– इस ऊँचाई पर साधना के पहुँचने पर आनन्द ही आनन्द है, मस्ती ही मस्ती है।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव आना।। (रामचरितमानस, ५/३३/३)

भजन के सिवा उस सन्त को कुछ अच्छा लगता ही नहीं। भले ही उसके वस्त्र फटे-चिथड़े हों, कई-कई दिन उपवास में हों, उसकी मस्ती में कोई अन्तर पड़नेवाला नहीं है। उस गगन गुफा में–

बिनु चन्दा उजियारी दरसै, जहँ-जहँ हंसा नजर परै।

वहाँ बिना चन्द्रमा के ही उजाला रहता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं–

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९)

इस जगत्-रूपी रात्रि में सभी प्राणी निश्चेष्ट पड़े हुए हैं। इनमें से संयमी पुरुष जग जाता है। यही रूपक रामचरितमानस में भी है–

मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।

देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (रामचरितमानस, २/९२/२)

मोहरूपी रात्रि में सभी सो रहे हैं। जो दौड़-धूप कर रहे हैं मानो स्वप्न देख रहे हैं। उन्होंने कुछ एकत्र किया तो संसार को ही समेटकर इकट्ठा किया जो स्वप्नवत् है। उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।’ (रामचरितमानस, ३/३८/५) वह उस स्वप्न को ही घूम-फिरकर देख रहे हैं। जब साधक को इस जगत् में निर्लेप रहने की क्षमता आ गयी, ईश्वरीय मस्ती आ गयी तो जगत्रूपी रात्रि का घना अंधकार छटने लगता है। ईश्वर का सम्पूर्ण प्रकाश तो नहीं किन्तु क्षीण प्रकाश दिखायी देने लगता है। उस उजाले में दिखायी क्या देता है?

जहँ तहँ हंसा नजर परै’– उस क्षीण प्रकाश में भी जहाँ कहीं भी उसकी दृष्टि जाती है, ‘तुझमें मुझमें खड्ग खम्भ में’– सर्वत्र उसे आराध्य देव का स्वरूप दिखायी पड़ने लगता है।

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (रामचरितमानस, २/१३०/७)

उसके लिए न तो स्वर्ग स्वर्ग के रूप में है जिसकी वह कामना करे; न नरक नरक के रूप है जिससे वह बचने का प्रयास करे। बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहे।’ उसने हर आत्मा को ईश्वर-पथ का पथिक पाया।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके पण्डिता: समदर्शिन:।। (गीता, ५/१८)

वे विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और उस चाण्डाल में जो एक सियार लटकाये हुए है, जाल पास में है; कुत्ता, गाय और हाथी में पण्डिता: समदर्शिन:’– जो पण्डित हैं, उस पथ के पूर्ण ज्ञाता हैं जिन्हें ईश्वरीय अनुभूति का संचार प्राप्त है– इन सबमें वह समान दृष्टिवाले होते हैं। उनके लिये विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण न कोई विशेषता रखता है न चाण्डाल कोई हीनता रखता है; न कुत्ता अधर्म है और न गाय धर्म है; क्योंकि उनकी जहाँ भी दृष्टि पड़ी, अपने आराध्यदेव को ही खड़ा पाया। अन्तर इतना ही है कि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण कुछ उन्नत श्रेणी का है और वह चाण्डाल साधना में अभी नीचे है, लेकिन है उसी पथ का पथिक। उसमें भी आत्मा का ही संचार है। इसलिए जहँ तहँ हंसा नजर परै’– जहाँ भी उसकी दृष्टि पड़ती है, आराध्य का प्रसार ही समझ में आता है। इसके पश्चात्–

दसवें द्वारे ताली लागी’

ताली? जो ताले को खोलती है। गीता में है– नवद्वारे पुरे देही’ (५/१३)– यह शरीर नौ दरवाजोंवाला नगर है। साधक ने इन द्वारों को, मनसहित इन्द्रियों को संयमित किया, ध्यान धरा, वाद्य सुनायी पड़ा, संसार में रहते हुए निर्लेप रहने की क्षमता आयी, इस जगत्रूपी रात्रि में एक क्षीण ईश्वरीय प्रकाश का संचार मिला, जहाँ भी दृष्टि पड़ी तो अपने प्रभु के स्वरूप को प्रसारित पाया– जब इतना संयम सध गया तो इसके साथ ही दसवें द्वारे ताली लागी’। दसवाँ द्वार है ब्रह्मरन्ध्र। जिस द्वार से ब्रह्म में प्रवेश पाया जाता है, वह है योग-युक्ति की कुञ्जी।

सदगुरु दीन्ही ताला कुंजी, जब चाहूँ तब खोलू किवड़िया।

योगयुक्ति की कुंजी मिलते ही अलख पुरुष जाको ध्यान धरै’। अलख अचिन्त्य, अगोचर परमात्मा का सम्बोधन है। मनुष्य के पास इन्द्रियाँ हैं; मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हैं किन्तु परमात्मा इन सबसे परे है। इनके माध्यम से वह अलख है, देखने में नहीं आता। वह अनुभवगम्य है। किन्तु योगयुक्ति का जहाँ संचार हुआ, ताली लग गयी तो अलख अगोचर वह परमात्मा ही ध्यान धरै’। अब तक हम ध्यान धरते थे, इस अवस्था के पश्चात् भगवान ही हमारा ध्यान करने लग जाते हैं। भजन हमार हरि करैं, हम पायो बिसराम।’ ऐसा साधक पेंशनीयर हो जाता है, वह तृप्त हो जाता है। जुगन जुगन की तृषा बुझानी’– जन्म-जन्मान्तरों से प्यासी आत्मा की प्यास बुझ जाती है। कभी यह जीव चक्रवर्ती नरेश बना, कभी कंगाल तो कभी उद्योगपति; किन्तु रहा बेचारा दरिद्र का दरिद्र! इसकी प्यास कभी मिटी ही नहीं। किन्तु दसवें द्वार में ताली लगते ही उस अलख अविनाशी परमात्मा ने उसे उठा लिया। अब वह परमात्मा ही हमारा ध्यान धरने लगा। इस अवस्था में जन्म-जन्मान्तरों से जो आत्मा तृषित थी, उसकी प्यास मिट गयी, आत्मा अपना स्वरूप पा गया।

करम भरम अघ व्याधि टरै।

कर्मों के लेख समाप्त! जो चिन्तन-कर्म अनिवार्य था, उसकी भी आवश्यकता पूर्ण हुई। जो भ्रम था कि भगवान क्या हैं? कैसे हैं? ऐसी भ्रान्ति भी समाप्त हो गयी। पतन की ओर ले जानेवाली पाप-प्रवृत्ति भी समाप्त हो गयी। भव-व्याधि भी दूर हो गयी।

काल कराल निकट नहिं आवे, काम क्रोध मद लोभ जरै।

काल अर्थात् समय! यह अत्यन्त प्रबल है। समय का परिवर्तन बाल पका देता है, दाँत गिरा देता है, आयु के अन्तिम क्षण तक पहुँचा देता है। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।’ (रामचरितमानस, ७/९३/८) ऐसा दुर्जय काल भी उस भक्त के समीप नहीं आता; क्योंकि अब भक्त का ध्यान भगवान कर रहे हैं। वह काल भगवान को धोखा देकर भक्त को ले नहीं जा सकता, काल साधना में उलटफेर नहीं कर सकता। इस साधन का स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान बन्धन से छुटकारा दिलाकर ही छोड़ता है। भगवान के अंक में स्थान मिल जाने के पश्चात् काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मत्सर– प्रकृति के ये विकार सदा के लिये शान्त हो जाते हैं। और जब विकार शान्त हो गये–

कहत कबीर सुनो भाई साधो! अमर होय कबहूँ मरै।

सन्त कबीर कहते हैं– सन्तो! ध्यान दें। वह व्यक्ति अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है जहाँ मृत्यु का समावेश नहीं है। कबीर ठीक वही घोषणा कर रहे हैं जो आदिशास्त्र गीता में है–

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२)

इसके पूर्वश्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि ईश्वर सबके हृदय में निवास करता है। यहाँ इस श्लोक में कहते हैं– सम्पूर्ण भावों से उसी हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाओ। संसार में कोई गायत्री की शरण में, कोई विन्ध्यवासिनी की शरण में तो कोई पशुपतिनाथ, कोई अल्लाह, कोई गॉड की शरण में जाते ही रहते हैं। मान लें, इन सारी मान्यताओं को तोड़कर हम हृदयस्थ ईश्वर की शरण में चले ही जायँ तो उससे क्या लाभ होगा? भगवान कहते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिं’– उसके कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे। इतना ही नहीं, स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– तुम उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। यही कबीर भी कह रहे हैं– अमर होय कबहूँ मरै’

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आरम्भ में भजन में मन नहीं लगता, भजन में रस नहीं मिलता। कबीर आश्वस्त करते हैं कि भजन में रस मिलता है लेकिन एक निश्चित दूरी तय कर लेने के पश्चात्। वहाँ तक की दूरी तो आपको ही तय करनी होगी। जब चित्त संकल्प-विकल्प से रहित हो शून्य में एकाध मिनट भी टिकने की क्षमता प्राप्त कर लेता है; यद्यपि वह अभी आकाशवत् तो नहीं हुआ किन्तु उसे आकाश में प्रवेश मिल गया है। उसे कन्दरा में प्रवेश मिल गया तो तुरन्त वह रस राम सुधा रस’– ब्रह्म-पीयूष प्रसारित हो जायेगा। यह स्रोत अजस्र है, अनवरत है। एक बार जागृत हुआ तो फिर कभी आपका साथ नहीं छोड़ेगा, क्योंकि ईश्वर-पथ में आरम्भ का, बीज का नाश नहीं है। माया में कोई यन्त्र नहीं है कि उसे मिटा दे।

 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। (गीता, २/४०)

ईश्वर-दर्शन की एक नियत विधि है जिसे नियत कर्म कहते हैं, उसका परिपालन, उसका आचरण ही धर्म है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी धर्म नहीं है। इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। इस निष्काम कर्मयोग में सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि स्वर्ग, ऋद्धियों या सिद्धियों में भरमाकर आपको बीच में ही कहीं खड़ा कर दे इसलिए स्वल्प साधन भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। अगले जन्मों में जहाँ से साधन छूटा था, व्यक्ति वहीं से आरम्भ करता है और कुछेक जन्मों के अन्तराल से व्यक्ति वहीं पहुँच जाता है जिसका नाम परमगति है, परमधाम है। धर्म कभी बदलता ही नहीं।

 अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्। (गीता, ६/४५)

ईश्वर-पथ में यह सुविधा है कि श्वास के रहते-रहते यदि मनुष्य से इस पथ को समझकर दो कदम भी चलते बन गया तो यद्यपि तत्काल मुक्ति तो नहीं हुई किन्तु उसके मोक्ष का आरक्षण भली प्रकार हो गया। यह गीतोक्त आचरण आप सबकी मुक्ति का बीमा है। इसमें अनेक जन्मों के अन्तराल की सम्भावना इसलिए है कि कुसंग-सुसंग के प्रभाव से गन्तव्य की प्राप्ति में विलम्ब या शीघ्रता हो जाती है। कुछ ऐसे स्तर के लोग भी हैं जो एक ही जन्म में यह लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं; अनेक ऐसे भी हैं कि करोड़ कुसंग आ जाय, उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पूज्य गुरुदेव को रहीम का यह दोहा बहुत प्रिय था–

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।

चंदन बिष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।

– – –

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं।

फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।। (रामचरितमानस, १/३/१०)

दैवयोग से बड़े सज्जन पुरुष भी कभी-कभी कुसंग में पड़ जाते हैं लेकिन जिस प्रकार सर्प के मस्तक में मणि और विष साथ-साथ रहने पर भी मणि विष से प्रभावित नहीं होती, प्रत्युत् विष के प्रभाव को भी हर लेती है, उसी प्रकार सज्जन पुरुष कुसंग में भी अपने निर्मल स्वभाव को नहीं छोड़ते बल्कि दुष्टों को भी सन्मार्ग पर ही ले आते हैं। अत: सबको चाहिए कि विषम परिस्थितियों में भी मर्यादा का सदैव ध्यान रखें। हमारा चिन्तन ही कैसा है कि दुर्गुणों का प्रभाव पड़ जाय? जो साधक हरि के भरोसे होते हैं, समर्पण के साथ एक प्रभु का सुमिरण करते हैं, ऐसे ‘हरि भक्तन के पास न आवे भूत प्रेत पाषंड।’– उस भक्त पर जादू-टोना, जन्तर-मन्तर, ग्रह-दशा इत्यादि कुछ भी प्रभाव नहीं डाल पाते, उसके समीप भी नहीं जाते–

सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू।

बड़ रखवार रमापति जासू।। (रामचरितमानस, १/१२५/८)

।। श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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