साईं के संग सासुर आई।।
संग न सूती स्वाद न मानी, गयो जोबन सपने की नाईं।
साईं के संग……..।।
जना चार मिलि लगन शोधाई, जना पाँच मिलि मण्डप छाई।
सखी सहेलरि मंगल गावें, सुख दुख माथे हरदी चढ़ाई।।
साईं के संग……..।।
नाना रूप परी मन भँवरी, गाँठि जोरि भाई पतियाई।
अरघे दे लै चलीं सुहासिन, चौके राँड़ भई संग साईं।।
साईं के संग……..।।
भयो विवाह चली बिन दुलहा, बाट जात समधी समुझाई।
कह कबीर हम गवने जइबै, तरब कन्त लै तूर बजाई।।
साईं के संग……..।।
इस पद में सन्त कबीर ने परमात्मा को ‘साईं’ कहकर सम्बोधित किया है। अनुराग के मधुर भाव में सन्तों ने परमात्मा को अपना पति या प्रियतम मानकर उपासना आरम्भ किया है। सन्त कबीर ने ‘हरि मोरा पीव मैं राम की बहुरिया’, ‘हम घर आये राजा राम भरतार’, ‘प्रियतम मोसे रूठल हो’, ‘मैं उस पिया को रिझा रहा हूँ’– परमात्मा को पति कहा है। मीरा ने भी कहा, ‘मेरी पत राखो गिरधारी’– पत कहते हैं मर्यादा को, मान-सम्मान को। मीरा अनुरोध करती है कि प्रभो! मेरी मर्यादा की रक्षा करें! लोक व्यवहार में किसी ने अपशब्द कह दिया तो इज्जत चली गयी। किसी ने सम्मानित कर दिया तो इज्जत दोगुनी-चौगुनी हो गयी। यह क्षुद्र इज्जत तो प्राय: आती-जाती रहती है, शरीर में जब तक श्वास है तब तक के लिए है। चार-छ: पीढ़ी पहले के पूर्वजों में से कितनों का नाम लोग जानते हैं जबकि अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और संस्कृति की मर्यादा रक्षा करने में वह भी उतने ही प्राणपण से लगे थे जितना हम-आप हैं। सन्त कबीर कहते हैं–
कबिरा नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाइ।
सोइ पुर पाटन सोइ गली, बहुरि न देखा आइ।।
पूर्वजों की उस इज्जत का आज कहीं लेखा-जोखा नहीं है। किन्तु ‘ईश्वर अंस जीव अबिनासी।’– परमात्मा का विशुद्ध अंश होते हुए भी हमारी-आपकी आत्मा बारम्बार गर्भवास की यातना सहन करती हुई, मल-मूत्र-पीव से सनी हुई योनियों का भ्रमण कर रही है; इससे अधिक मर्यादाहीनता क्या होगी? इस दयनीय दशा से उबार लेने में मात्र परमात्मा ही सक्षम हैं, इसलिए भजनानन्दियों ने परमात्मा को पतिरूप से भी सम्बोधित किया है।
रामचरितमानस का प्रसंग है। ऋष्यमूक पर्वत पर भगवान राम को देख सुग्रीव चिन्तित हो गये कि कदाचित् बालि ने उन्हें भेजा हो। वह शूरवीर प्रतीत हो रहे हैं। उन्होंने हनुमान को परीक्षा लेने के लिए भेजा कि यदि उनसे अनिष्ट की आशंका हो तो संकेत कर देना, मैं भाग जाऊँगा। हनुमान ने प्रश्न-परिप्रश्न करके पहचान लिया कि जो अवतार हुआ था वह यही राम हैं, चरणों में गिर पड़े। भगवान ने उन्हें सान्त्वना दिया। मानसकार लिखते हैं– ‘देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।’ (रामचरितमानस, ४/३/१)- हनुमान जी ने पति को अनुकूल समझा। हनुमान स्त्री तो थे नहीं, वह वानर जातीय पुरुष थे, अखण्ड बाल ब्रह्मचारी थे; किन्तु परमात्मा को पति माना। महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण भी भगवान से निवेदन करते हैं– ‘अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।’ (रामचरितमानस, ३/१०/२१)। भगवान पति हैं, वे उस मर्यादा को रखने वाले हैं, आवागमन से मुक्ति दिलाकर आपका सहज, निर्मल स्वरूप दिलाने वाले हैं, इसलिए सन्तों ने उन्हें पति कहकर सम्बोधित कहा, कहीं उन्हें प्रियतम कहा। प्रिय में भी उत्तम प्रियतम! एक बार सम्बन्ध जुड़ गया तो फिर कभी विछोह नहीं होगा। इसी प्रकार इस भजन में कबीर ने परमात्मा को साईं अर्थात् स्वामी कहकर सम्बोधित किया।
भजन की पहली पंक्ति है– ‘साईं के संग सासुर आई।’– पहले साईं से सम्बन्ध जुड़ा, इसके पश्चात् सासुर आने का अवसर मिला। पहले परमात्मा का दर्शन-स्पर्श तब ‘स्व-सुरा’– स्वरूप में स्थिति का विधान है।
ईश्वर-पथ में एक रूढ़ि बहुत समय से प्रचलन में रही है। आज कोई गृहत्याग कर विरक्त होता है तो आरम्भ के चार-छ: माह तक जब तक साधुवेष की भाषा, रहन-सहन का सैद्धान्तिक अध्ययन कर रहा होता है, अपने को साधक मानता है और सूत्रों का अभ्यास हो जाने पर अपने को सिद्ध, पूर्ण, परमात्मस्वरूप मान बैठता है। अब यदि कहीं भगवान है भी तो उससे हल्का ही होगा।
इस प्रकार की रूढ़ियाँ श्रीकृष्णकाल में भी थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने इसका खण्डन करते हुए कहा– अर्जुन! न तो ऐसा है कि कर्म न आरम्भ करने से कोई नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को प्राप्त होता है और न आरम्भ की हुई क्रिया को त्याग देने से कोई उस परम सिद्धि को प्राप्त होता है (गीता, ३/४)। तुझे ज्ञानमार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्म– दोनों के अनुसार कर्म तो करना ही है। कर्म का अर्थ है आराधना, कर्म का आशय है चिन्तन। क्षण मात्र भी कोई पुरुष बिना कर्म किये नहीं रहता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश होकर वह गुणों में बरतता है (गीता, ३/५)। सत्, रज और तम– इन तीन गुणों का नाम प्रकृति है। जब तक यह त्रिगुणमयी प्रकृति है, इन तीनों गुणों में से कोई न कोई गुण आपके अन्त:करण में जीवित हैं, गुण आपसे कार्य करा लेंगे। ऐसी परिस्थिति में क्षणमात्र भी मन शान्त नहीं हो सकता। वह गुण आपको चलायमान कर देगा। इतने पर भी जो लोग हठ से इन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का स्मरण करते रहते हैं; कहते हैं– मैं ज्ञानी हूँ, पूर्ण हूँ, आत्मा हूँ, अर्जुन! वह दम्भाचारी है, पाखण्डी है, धूर्त है (गीता, ३/६)। गीता के अध्याय छ: में योगेश्वर ने बताया–
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।। (गीता, ६/१)
फल के आश्रय से रहित होकर ‘कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया (नियत कर्म) को जो करता है, वही संन्यासी है, वही योगी है; केवल अग्नि को त्यागने वाला या क्रिया को त्यागने वाला न तो संन्यासी है न योगी। आजकल भी अग्नि का उपयोग न करने वालों, क्रिया को त्यागने वालों का संगठन चल रहा है जो कहते हैं– मैं ज्ञानी हूँ, आत्मा हूँ, अग्नि नहीं छूता; और वे भजन की निर्धारित क्रिया भी नहीं करते। श्रीकृष्णकाल में भी थे। भगवान ने कहा– ऐसे लोग न संन्यासी हैं न योगी।
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।। (गीता, ६/२)
जिसे संन्यास कहते हैं उसी को अर्जुन! तू योग जान; किन्तु संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष संन्यासी अथवा योगी नहीं हो सकता। मान लें कोई कह दे कि हम संकल्प नहीं करते, हमने संकल्पों का त्याग कर दिया। मात्र कहने से संकल्प नहीं रुकते। यह तो विचारों का प्रवाह है। संकल्प कब निरुद्ध होते हैं?– इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते।। (गीता, ६/३)
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले पुरुष को चाहिए कि कर्म करे। कर्म में भी नियत कर्म करना है। वह कर्म आरम्भ हुआ और होते-होते इतना उन्नत, इतना सूक्ष्म हो गया कि योगारूढ़ता आ गयी, योग की परिपक्वता आ गयी। इस योगारूढ़ता में ‘शम: कारणमुच्यते’- शम अर्थात् सर्वसंकल्पों का अभाव, मन का अचल स्थिति में ठहरना ही कारण है। अर्थात् जब तक हम आप क्रिया नहीं करेंगे, क्रिया में उत्थान होते-होते योगारूढ़ता नहीं आ जायेगी, तब तक संकल्प पिण्ड नहीं छोड़ेंगे। इसके पूर्व कोई भी संन्यासी नहीं, कोई योगी नहीं होता।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते।। (गीता, ६/४)
जिस काल में पुरुष न अपने इन्द्रियों के भोगों पर आसक्त होता है और न कर्मों में आसक्त होता है, उस समय सर्वसंकल्पों का अभाव हो जाने पर वही संन्यासी है, उसी को योगी कहते हैं अर्थात् भजन नितान्त आवश्यक है किन्तु ईश्वरपथ में नकल का इतना बाहुल्य है कि दस दिन घर छोड़े हुआ, ग्यारहवें दिन पूर्ण योगी हो गये। यह विकृति कबीर काल में भी थी, आज भी लाखों की संख्या में ये हैं जो– पाँच तत्त्व, पच्चीस प्रकृति, आत्मा शुद्ध, शरीर नश्वर, मैं इन्द्रियों का विषय नहीं हूँ, इन्द्रियों से परे हूँ, मन से परे हूँ, मैं अखण्ड-शाश्वत-एकरस हूँ– इतना कहते बन गया तो योगी कहलाने लगते हैं। सन्त कबीर कहते हैं– ऐसा कहने से कोई पूर्ण नहीं होता। पहले साईं का संग, दर्शन और स्पर्श; जहाँ उस प्रभु की संगत हुई, सहज स्वरूप में स्थिति आती है, अन्यथा कदापि नहीं।
बिन देखे वा देश की, बात कहे सो कूर।
आपुन खारी खात है, बेचत फिरे कपूर।।
यदि कोई बिना देखे कहता है कि वह देश ऐसा है तो वह कूर है। स्वयं तो खारा नमक खा रहा है और उसे कपूर कहकर बेचता फिर रहा है।
बिन देखे बिन दरस परस बिन, नाम लिये का होई।
धन के कहें धनिक जौ होवे, निर्धन रहे न कोई।।
परमात्मा जब तक देखने को न मिले, दर्शन और स्पर्श न मिले, तब तक कभी कल्याण नहीं है। इसलिए सन्त कबीर कहते हैं– पहले साईं का संग, फिर स: माने वह परमात्मा, परमात्मा के स्वरूप में आपके स्वर की स्थिति आई। वह परमात्मा है कैसा?–
संग न सूती स्वाद न मानी, गयो जोबन सपने की नाईं।
साईं के संग……..।।
लोक-व्यवहार में देखा जाता है कि शादी-विवाह के पश्चात् पति-पत्नी साथ रहते हैं किन्तु इस साईं के साथ रहने का अवसर मिला ही नहीं क्योंकि जहाँ प्रभु जानने में आये तो ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ हो जाई।’ सेवक सदा के लिए खो जाता है, स्वामी का स्वरूप ही शेष बच रहता है। संग तो तब हो जब वह अलग, हम अलग हों। जब तक हम ईश्वर-पथ के पथिक थे तब तक अपनी अवस्थाओं और उससे मिलने वाली अनुभूतियों का स्वाद था कि प्रभु ने आज हमें ऐसा बताया, यह अनुभव मिला किन्तु जब उसके दर्शन, स्पर्श के साथ वही हो गये, उन्हीं के भाव को प्राप्त हो गये तो कौन किसका आनन्द ले; इसलिए वह स्वाद भी समाप्त और ‘गयो जोबन सपने की नाईं।’– साधना के उत्कर्ष का भान, ज्ञान-ध्यान की क्षमता, आन्तरिक शक्ति– यह सब जवानी स्वप्न जैसा प्रतीत होता है जैसे हम परमात्मा से कभी भिन्न थे ही नहीं। इसी को कबीर कहते हैं– ‘सन्तो! सहज समाधि भली।’- यह स्थिति सर्वोपरि है, सम है, आदि है, उसी के साथ रहनी हो गयी, उस परमात्म-भाव में प्रवेश मिला। ‘साईं के संग सासुर आई’– सुरा कहते हैं श्वास को! स माने वह परमात्मा सुरा में प्रवाहित हो गया और स्थिति आ गयी।
सारांशत: पहले दर्शन तब स्थिति! जब स्थिति आई, वह परमात्मा संग निवास करने के लिए भिन्न नहीं रह गया, न स्वाद ही रह गया कि यह अनुभव मिला, न साधना का यौवन ही रह गया कि हमारे भीतर यह शक्ति है, ज्ञान का बल है, ध्यान का बल है किन्तु वहाँ तक की दूरी तय कैसे हुई, इस पर कहते हैं–
जना चारि मिलि लगन शोधाई, जना पाँच मिलि मण्डप छाई।
‘जना चारि’– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा– नाम जपने की चार विधियाँ हैं। क्रमश: एक वाणी ने दूसरी को पकड़ा, दूसरी ने तीसरी को पकड़ा, तीसरी से चौथी पकड़ में आ गयी, क्रमश: चारों वाणियाँ मिलती चली गयीं। इनके द्वारा लगन की शोध मिलती गयी, लगन संशोधित होती गयी– ‘जना चारि मिली लगन शोधाई’। ‘जना पाँच’– रूप, रस, शब्द, गन्ध और स्पर्श! आँखें रूप देखती हैं तो हृदय में रूप आ गया। जिह्वा रस ढूँढ़ती है तो हृदय ने ब्रह्मपीयूष चखा, त्वचा ने प्रभु के चरणों का स्पर्श पाया, कान ने प्रभु की वाणी सुनी। इन्द्रियाँ जो भोग बाहर ढूँढ़ रही थीं, वे सिमटकर हृदय में इष्ट के अनुरूप संचारित हो गयीं तो मण्डप छा उठा। परमात्मा की छत्रछाया, वरदहस्त मिल जाता है। पहले यही पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ भजन में बाधक हुआ करती थीं–
पाँचों कुतिया राम की, करें भजन में भंग।
इनको टुकड़ा देइके, तब करिये सतसंग।।
कबीर ने इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को कुतिया की संज्ञा दी किन्तु जब पाँचों संयत हो गयीं, प्रभु के चरणों का स्पर्श पाया, उन्हीं के रूप से संतुष्ट हो गयीं, उनकी वाणी के लिए लालायित हो गयीं, मन-क्रम-वचन से उधर ही लौ लग चली, पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ साथ देने वाली प्रभु के अनुरूप ढल गयीं तहाँ प्रभु की छाया मिल गयी, मण्डप छा गया। इसके पश्चात्–
सखी सहेलरि मंगल गावें, सुख दुख माथे हरदी चढ़ाई।
इसके पूर्व इन्द्रियाँ ही साधक की शत्रु थीं। ‘जहँ तहँ इन्द्रिन्ह तान्यो’ (विनयपत्रिका, पद ८८)- जिधर ही इन्होंने खींच लिया, गिरना पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्रियों को बलात् घसीटकर दस्यु की तरह अपहर्त्ता बताया। इन्द्रियाँ प्रमथन स्वभाववाली हैं। जिस एक इन्द्रिय के साथ भी मन रहता है, उस अयुक्त मन को घसीटकर, उठाकर पटक देती हैं। किन्तु साधना के सही दौर में पड़कर जब ये संयत हो जाती हैं तो यही मित्र हैं, सखी बन जाती हैं।
आदि शंकराचार्य ने कहा– ‘के शत्रवे सन्ति निजेन्द्रियाणि। तान्येव मित्राणि जितानि यानि।’ शिष्य ने पूछा– भगवन्! शत्रु कौन है? उन्होंने बताया– अपनी इन्द्रियाँ ही! किन्तु यदि वे जीत ली जाती हैं तो मित्र बनकर मित्रता में बरतती हैं। अब जब ये इष्ट के अनुरूप ढल गयीं तो अब सखी हैं, सहेलरि हैं, भली प्रकार साथ निर्वाह करनेवाली हैं। ये ‘मंगल गावे’– आज तक ये इन्द्रियाँ अमंगल गायन करती थीं, जन्म-मृत्यु की परिधि में घुमाने का अनिष्टकारी कृत्य करती थीं, अब ये मंगल अर्थात् परम कल्याण का गायन-चिन्तन करने लगीं। ‘सुख दुख माथे हरदी चढ़ाई’– हृदय की स्थिति सुख-दु:ख से ऊपर उठ गयी। इन्द्रियाँ ही तो सुख-दु:ख धारण करती हैं। जब वे मंगल गायन में लग गयीं तो सुख-दु:ख का भान ही समाप्त हो गया। अनुकूल वस्तु मिलने पर न प्रसन्नता हो और प्रतिकूलता में कोई दु:ख प्रतीत न हो तब समझना चाहिए कि अब साधन ठीक चल रहा है, इन्द्रियाँ सही दिशा में हैं। इसके आगे बन्धन छूटने का समय आने पर विघ्न आने लगते हैं–
‘नाना रूप पड़ी मन भँवरी’– इन्द्रियों के संयत हो जाने पर ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ मन में भँवर डालने लगती हैं। उनके प्रलोभन में फँसने पर साधक नष्ट हो जाता है–
छोरत ग्रन्थि जानि खगराया।
बिघ्न अनेक करइ तब माया।।
(रामचरितमानस, ७/११७/६)
जब माया देखती है कि अब इस जीव का बन्धन छूटने वाला है, वह अनेक विघ्न उपस्थित कर देती है–
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई।
बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।।
कल बल छल करि जाहिं समीपा।
अंचल बात बुझावहिं दीपा।।
(रामचरितमानस, ७/११७/७-८)
वह ऋद्धियाँ प्रदान कर देती है, यहाँ तक कि सिद्ध बना देती है। ऐसी अवस्था वाला साधक समीप से निकल भर जाय तो मरणासन्न व्यक्ति की साँस लौट आयेगी। श्वास भले ही लौट आये, उसका स्वरूप ही ऐसा है; किन्तु जहाँ साधक ने स्वीकार किया कि यह हमारे माध्यम से हुआ है, वहाँ माया कार्य कर लेगी। यही मन का भँवर में फँसना है। भगवान कभी सिद्ध नहीं बनाते। माया ही थोड़ा चारा फेंक देती है। माया कला करके, छल करके बलपूर्वक विज्ञानरूपी दीप को बुझा देती है। अन्त:करण के प्रवेशद्वार इन्द्रियों के देवता भी विघ्न उपस्थित करते हैं। वे विषयरूपी हवा के झोकों को देखते ही हृदय के किवाड़ खोल देते हैं, विज्ञान दीप बुझ जाता है–
ग्रन्थि न छूटि मिटा सो प्रकासा।
बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।
(रामचरितमानस, ७/११७/१४)
बन्धन छूटने नहीं पाया और प्रकाश लुप्त हो गया। कुछ दिनों का चमत्कार भी समाप्त हो गया। विषयरूपी वायु से बुद्धि व्याकुल हो गयी। इसी को कबीर ने भँवर की संज्ञा दी है जो ऋद्धि-सिद्धि, मान-सम्मान के रूप में साधक के प्रलोभन हेतु आते हैं।
गाँठ जोरि भाई पतियाई।
ईश्वर-पथ में भाव ही भाई है। यदि भाव नष्ट हो गया, फिर तो कुछ भी नहीं बचा! किन्तु यदि इष्ट में भाव से डोरी लगी हुई है तो यद्यपि अवरोध आयेंगे, फिर भी कटते जायेंगे। यदि भाई ने गाँठ जोड़ लिया है, भाव का बन्धन पक्का है तो इस भँवर से वह ‘पतियाई’– पार लगा देगा। प्रभु विश्वास देते जाते हैं, साधक पतियाने लगता है। वह देखता है कि विघ्न क्षणिक हैं, शाश्वत तो परमात्मा है।
अरघे दे ले चली सुहासिनि, चौके राँड़ भई संग साईं।
साईं के संग……..।।
अर्ध्य पाँवड़े पूजन समर्पित करते हुए जब तक अधूरी अवस्था थी, विकारों को समाप्त करना और ईश्वर की प्रक्रिया में प्रवेश लेना था, तब तक तो ‘ले चली सुहासिनि’– प्रभु हर समय उठाते-बैठाते-चलाते, हर समय भजन कराते निर्भय कराते ले चलते थे। वे थे और मैं था उनका अनुयायी! यही सौभाग्यशालिनी सुहासिन का चलना है किन्तु ‘चौके राँड़ भई’– मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार– यह चतुष्टय अन्त:करण जिसे सूक्ष्म शरीर भी कहते हैं, ये चारों जब कूटस्थ हो गये, स्थिर हो गये, यही कबीर चौरा या चौका है। जहाँ ये स्थिर हुए, अब संकल्प-विकल्प करे तो कौन करे? सेवक स्वामी में परिवर्तित हो गया, पति के रूप में दिखाने को कोई अलग बचा ही नहीं। तो क्या प्रियतम समाप्त हो गये? कबीर कहते हैं– नहीं! ‘संग साईं’– जिस प्रभु को ढूँढ़ना था, उसको अपनी आत्मा में प्राप्त कर लेता है, साईं तो संग में ही है। आत्मा-परमात्मा का भेद समाप्त हो गया। वह अभिन्न हो गया। इस चित्त-निरोध के साथ–
मन मिटा माया मिटी, हंसा बेपरवाह।
जाका कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह।।
मन के निरोध होते ही मन मिट गया और मन के मिटते ही माया भी मिट गयी। मन के ऊपर ही तो आना-जाना था। वह धरातल ही समाप्त हो गया। माया रुके तो कहाँ रुके? उस अवस्था में हंस अर्थात् यह जीवात्मा निर्द्वन्द्व और निश्चिन्त हो जाता है क्योंकि आगे कोई सत्ता ही नहीं रह गयी। ऐसा साधक बादशाहों का भी बादशाह है।
मन मथ मरे न जीवे, जीवहिं मरन न होय।
सहज सनेही राम बिन, भव पार न पावै कोय।।
मन का मन्थन करना और मर जाना; मन को ऐसा मिटा देना कि वह पुन: जीवित न हो, फिर वह कभी जीव भाव को प्राप्त नहीं होगा। वह ऐसी स्थिति पा जायेगा कि उस जीव की फिर कभी मृत्यु नहीं होगी किन्तु यदि राम से ‘सहज सनेह’– हार्दिक लगाव नहीं है तो यह भव पार जाने वाली अवस्था नहीं मिल सकती। न तो आपको अविनाशी पद मिलेगा न परमात्मा। मन ही बीच में एक रुकावट था, वही निरुद्ध हो गया तो ‘चौके राँड़ भई’– चित्त-निरोध के साथ ही परम चेतन परमात्मा का प्रतिबिम्ब हृदय में आ जायेगा। बाहर कहीं प्रभु रह ही नहीं गया, बाहर कोई दिखावा नहीं। वह हृदय-देश में प्रकट हो गये और मैं भी उसी भाव में स्थित हो गया। अन्त में कहते हैं–
भयो विवाह चली बिन दुलहा, बाट जात समधी समुझाई।
सम्बन्ध तो हुआ लेकिन ‘चली बिन दुलहा’– अलग से हम बतायें कि दूल्हा यह है तो वहाँ कोई दूल्हा नहीं है। भक्तिपथ पर चलते-चलते ‘सम आदि स: समाधि’– आदि तत्त्व परमात्मा है, उसके साथ ही स्थिति आयी तो जो स्वरूप भूला था, वह स्वरूप पकड़ में आ गया। वेदान्तियों का शुद्ध-बुद्ध शाश्वत यही है किन्तु वे केवल बातों से सिद्ध करना चाहते हैं जबकि कबीर के अनुसार यह साधनगम्य है। बिना साधन के न तो चित्त कूटस्थ होगा और चित्त के रहते न माया पिण्ड छोड़ेगी और न दर्शन, प्रवेश की स्थिति ही मिलेगी। ‘कह कबीर हम गवने जइबे’– कबीर कहते हैं– मैं इस पथ पर गमन करूँगा। किसलिए? तरने के लिए, भवसागर पार हो जाने के लिए! तरने की पहचान क्या है? कबीर के शब्दों में ‘तरब कन्त लै तूर बजाई’– उस कन्त अर्थात् प्रियतम को प्राप्त करके तुरीयावस्था में सदैव निमग्न रहूँगा। तूर अर्थात् तुरही बजाकर, डंके की चोट पर उस स्थिति को प्राप्त करके रहूँगा।
कबीर ने साधक को प्राय: लड़की के रूप में सम्बोधित किया है क्योंकि भजन शरीर नहीं करता। शरीर तो साधनधाम है। आप से या माताओं से साधन-भजन जब भी पार लगता है तो इष्टोन्मुखी लगन ही भजन कराती है। तुलसी हो, मीरा हो अथवा मदालसा; उनमें इष्टोन्मुखी लगन जागृत हुई, उसने भजन कराया। इसलिए लौ रूपी लड़की। लगन उत्थान होते-होते जब समाधि में प्रवेश पा गयी तो उसमें आत्मस्वरूप की अनुभूति मिल गयी और इसी का नाम मोक्ष है। कबीर कहते हैं– मैं इसी पथ पर गमन करूँगा। इस पथ पर मैंने चलकर देखा है। किसलिए? उस प्रभु का साक्षात् दर्शन करने के लिए, तर जाने के लिए और भवसागर तर जाने के पश्चात् सदा उस प्रभु में निमग्न रहने के लिए। अत: भजन नितान्त आवश्यक है।
अस्तु, जबसे आपकी समझ काम करने लगे, करना इतना ही है कि आप जिस ईश्वर की सन्तान हो- ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’– उस ईश्वर के प्रति हृदय में श्रद्धा स्थिर कर लो, नाम का जप करो, सत्पुरुषों की सेवा करो। स्वल्प अभ्यास से भी कुछ ही दिनों में आपको रास्ता मिल जायेगा।
!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-1’ से उद्धृत)