गणेश-पूजा

प्रश्न – गणेश पूजा क्या है? गणेश मंत्र क्या है?

उत्तर- गणेश कोई मंत्र नहीं है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार गणेश हिमाचल नरेश की कन्या पार्वती के पुत्र थे। पार्वती ने कठिन तपस्या के उपरान्त भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त किया। शिव-पार्वती कैलाश पर्वत पर निवास करते थे। एक बार माता पार्वती स्नान करने गयीं। अपने सेवकगणों को उन्होंने आदेश दिया कि भीतर कोई आने न पाये। उसी अवधि में भोलेनाथ शिव वहाँ पहुँच गये। नन्दी इत्यादि द्वारपालों ने उन्हें भीतर जाने दिया। पार्वती ने पूछा– क्या आपको यहाँ आने से किसी ने रोका नहीं? शंकर ने कहा– कह तो रहे थे किन्तु हमें रोकने का साहस किसमें है? पार्वती ने विचार किया कि इन सेवकों से आज्ञापालन की आशा व्यर्थ है। उन्होंने अपने उबटन से एक मानवाकृति का निर्माण किया, मंत्र पढ़ दिया, गणेश हो गये।

एक बार प्रश्न उठा कि इन तैंतीस करोड़ देवताओं में सर्वोपरि कौन है? मानक रखा गया कि जो पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले कर ले वही सर्वोपरि है। सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा को निकल पड़े। देवराज ऐरावत पर निकल पड़े, कार्तिकेय मयूर पर चल पड़े। गणेश का वाहन चूहा था, वह भी चल पड़े। मार्ग में देवर्षि नारद खड़े थे। उन महापुरुष को देवताओं ने प्रथम आने की शीघ्रता में अनदेखा कर दिया था; लेकिन गणेश अपने वाहन से उतरे, उन्हें सादर प्रणाम किया। देवर्षि ने पूछा– गणेश! कहाँ चले? उन्होंने बताया– प्रतियोगिता में भाग ले रहा हूँ। नारद ने उपाय बताया– इतनी लम्बी दौड़ लगाने से क्या होगा, रामनाम लिखकर उसी की परिक्रमा कर लो! गणेश ने वही किया। क्रमश: सभी देवता आ गये और सर्वप्रथम गणेश को बैठा पाया। निर्णय हुआ कि पृथ्वी का चक्कर लगाने से क्या होगा; परमात्मा का नाम ही सत्य है। इसी का जप आरम्भ करें। मंत्र की परिपक्व अवस्था में जब नाम मात्र रह जाय, अन्य विकल्प शान्त हो जायँ तभी पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण होती है, फिर शरीररूपी पृथ्वी को पुन: धारण नहीं करना पड़ेगा। इसी नाम की परिक्रमा से गणेश सर्वोपरि और प्रथम पूज्य हुए–

महिमा जासु जान गनराऊ।

प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

(रामचरितमानस, १/१८/४)

गणेश का तात्पर्य है शुभारम्भ! आरम्भ करे तो गणेश से। लेकिन आरम्भ करना है नामजप, वह भी भगवान का। भगवान के नाम की जो भी परिक्रमा पूर्ण कर ले वह गण अर्थात् सेवकों का नायक हो जायेगा; किन्तु यह जागृति सद्गुरु से होती है। नारद एक पूर्ण सद्गुरु थे।

गणेश नाम के अलग देवता की आकृति, वेशभूषा, शौर्य-पराक्रम की गाथाएँ पौराणिककाल की देन हैं। शौर्य और पराक्रम की भावना जनता में प्रोत्साहित करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी में कुश्ती, अखाड़े और रामलीला की परम्परा को बल दिया। इसी प्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणपति पूजन को लोकोत्सव का रूप प्रदान किया। यह उस समय की परिस्थिति थी, समय की माँग थी। इसमें धर्म और अध्यात्म को रेखांकित करने का प्रयास भ्रान्तियों को बढ़ाना देना है। इसी तरह समाज में अनेक मत-मतान्तर प्रचलन में हैं जिनके सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है–

कलिमल ग्रसे धर्म सब, लुप्त भये सदग्रन्थ।

दंभिन्ह निज मति कल्पि कर, प्रगट किये बहु पन्थ।।

(मानस, ७/९७-क)

कलिमल ने धर्म को निगल लिया है, सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये हैं। दम्भियों-पाखण्डियों ने बुद्धि से कल्पना करके बहुत से पंथ रच लिए; मत-मतान्तर बना लिए। ये अनेक पंथ, मत-मतान्तर क्या हैं? विनयपत्रिका के एक सौ तिहत्तरवें पद में तुलसीदास जी कहते हैं– बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँतहाँ झगरो सो। गुरु कह्यो रामभजन नीको मोहिं लगत राजडगरो सो।। पुराणों में बहुत से पंथों का वर्णन है, मत-मतान्तर मिलते हैं; सबमें आपसी झगड़े – गणेशपुराण में गणेश बड़े, शिवपुराण में शिव बड़े, विष्णुपुराण में विष्णु बड़े, देवीपुराण में देवी सर्वोपरि, पद्मपुराण में जैन-बौद्ध मत की निन्दा– जहाँतहाँ झगरो सो– ईर्ष्या-द्वेष से भरी पड़ी हैं पौराणिक गाथाएँ! गुरु कह्यो रामभजन नीको मोहिं लगत राजडगरो सो।– गुरु महाराज ने कहा– राम का भजन कर और यह हमें राजमार्ग जैसा लग रहा है। यह सर्वोपरि है, इसे करें। गणेश इत्यादि अनेकानेक वाह्य देवी-देवता पुराणों की देन हैं। एक प्रभु के प्रति समर्पित होकर, गुरु महाराज के आश्रित होकर नाम-जप आरम्भ करें, गणेश की तरह आपकी भी पूजा-परिक्रमा शुरू हो गयी और मंत्र की पूर्तिकाल में सुरत शब्द में समा गयी तो गणेश की ही तरह आपकी भी पूजा-परिक्रमा पूर्ण हो जायेगी।

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(‘नवयुवकों की जिज्ञासाऍं एवं भजन से लाभ’ से उद्धृत)

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