जाड़न मरो सारी रात
सन्त कबीर का यह भजन ध्यान के सम्बन्ध में है। संसार भर में ‘ध्यान शिविर’ लगा ही करते हैं फिर भी ध्यान एक उलझा हुआ प्रश्न है। हम ध्यान कैसे करें? ध्यान किसका करें? भगवान तो कण-कण में व्याप्त कहे जाते हैं; हम किस कण को प्रणाम करें? हम किस कण के स्वरूप को हृदय में धारण करें कि भगवान पकड़ में आ जायँ? उन प्रभु के लिये श्रीरामचरितमानस में आता है कि ‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।’– वह प्रभु बिना पैरों के चलता है, बिना कान के सुनता है, बिना शरीर के स्पर्श करता है, आँखों के बिना देखता है; अब आप ही बतायें कि हम ध्यान कैसे धरें? ऐसी परिस्थिति में केवल एक परमात्मा के प्रति दृढ़संकल्प होकर हम उन प्रभु के परिचायक नाम का जप करें। ओम् या राम – जो उस प्रभु का सीधा बोध कराता हो, ऐसे किसी एक नाम का जप करें। उनसे आप निवेदन करें– प्रभो! आप हमें देखें, रास्ता दें। यह अभ्यास करते-करते आपके और भगवान के बीच में, आपके और आपकी आत्मा के बीच में जो मल आवरण-विक्षेप का पर्दा पड़ा है जहाँ हल्का हुआ तो हृदय से ही वह आत्मा बोलने लगेगा, मार्गदर्शन करेगा और बता देगा कि सद्गुरु कहाँ हैं।
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेही।। (मानस, ७/६८/७)
विशुद्ध सन्त उसे उपलब्ध होते हैं, भगवान कृपा करके जिसे एक निगाह देख लें। जहाँ उन्होंने अनुकम्पा की तो सन्त-सद्गुरु जिस सिंहासन पर विराजमान होंगे या जिस दलदल में लोटते होंगे, या तो आप ही वहाँ पहुँच जायेंगे अथवा वे ही आपके पास आ जायेंगे। आपको विश्वास भी हो जायेगा और आगे पथ प्रशस्त भी हो जायेगा। जहाँ सद्गुरु मिल गये तो–
सदगुर मिलें जाहिं जिमि, संसय भ्रम समुदाइ। (मानस, ४/१७)
उस समय आपकी समझ में आ जायेगा कि ध्यान किसका धरें और कैसे धरें? पूज्य गुरुदेव भगवान के जीवन की घटना है। उन्हें बाल्यकाल से ही पहलवानी का शौक था। आरम्भ में तीन दिन ही पाठशाला गये, फिर गये ही नहीं। शिक्षा का पाठ जीवन से उठ गया। दण्ड-बैठक, कसरत में मन लगा। धीरे-धीरे उनकी गणना क्षेत्र के सुप्रसिद्ध पहलवानों में होने लगी। एक मन्दिर के बगल से वह निकले तो उन्हें आकाशवाणी हुई– ‘इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं!’
उस समय रात्रि के लगभग आठ बजे रहे होंगे। भादों की रात! धुप्प अँधेरा! उसी अँधेरे में वह उस खण्डहर-जैसे मन्दिर में गये, भीतर घूमकर लौट आये। उन्हें बड़ी चिन्ता हुई कि पता नहीं कौन हमारे पीछे पड़ा है? किसने आवाज दी कि इस मन्दिर में गुरु महाराज हैं? इसमें तो कोई नहीं है। इतने में भीतर से ही खाँसने की आवाज आयी। वास्तव में अँधेरे कोने में टाट लपेटे, पागल विक्षिप्त की तरह एक महापुरुष वहाँ बैठे थे। महाराज ने प्रकाश की व्यवस्था की, तीन दिन तीन रात सेवा में लगे ही रह गये। इसी अल्प अवधि में उन्होंने साधना का क्रम समझा और भजन में लग गये।
हमने उनसे पूछा था– ‘‘महाराज जी! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, हमलोगों को तो नहीं हुई?’’ महाराज ने कहा– ‘‘हो! यह शंका मुझे भी थी। इस पर भगवान ने बताया– हो! मैं पिछले सात जन्म से लगातार साधु रहा हूँ। चार जन्मों तक तो मैं योंही कपड़ा पहनकर झूठे ही घूम रहा हूँ। कभी विभूति, कहीं तिलक लगाये हूँ; लेकिन रहा हूँ संयमित साधु!’’ हमने जिज्ञासा की– ‘‘यह योंही झूठे का मतलब?’’ महाराज ने बताया– ‘‘हो! उस समय योग-साधना जागृत नहीं थी। ‘ध्यान किसका धरूँ?’– यह मालूम न था। लेकिन पिछले तीन जन्मों में मैं अच्छा साधु रहा हूँ जैसा होना चाहिए। उन जन्मों में भगवान मेरे हृदय से रथी थे, योग-साधना जागृत थी। पिछले जन्म में पार लग गया था, निवृत्ति हो चली थी किन्तु कुछ कुतूहल था। एक तो शादी क्या होता है, दूसरा देहाभिमान और गाँजा पीने की इच्छा, इसीलिये जन्म लेना पड़ा। जन्म लेते ही भगवान ने शादी-विवाह कराकर, सब कुछ दिखा-सुनाकर दो चटकना मारा कि यह पाप है और यह पुण्य! इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज! जब गुरु महाराज ही मिल गये तो शेष बचा क्या? गुरु महाराज से साधना-क्रम समझा और भजन में लग गये।’’
गुरु महाराज कहा करते थे– ‘‘हो! हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हम साधु होंगे! मन में कभी स्फुरण भी नहीं हुआ कि साधु भी हुआ जाता है! भगवान ने हमें जबरदस्ती साधु बना लिया।’’ इसलिये ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं है (गीता, २/४०) और जहाँ सद्गुरु मिले तो वह बता देते हैं कि नाम क्रमश: श्वास से कैसे जपें? इसके पश्चात् ध्यान के लिए स्वरूप सद्गुरु का ही पकड़ा जाता है और सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से आपके अन्दर साधना जागृत हो जाती है।
साधना-जागृति का अर्थ है कि जिस परमात्मा की हमें चाह है, प्रकृति की जिस सतह पर हम खड़े हैं, हमारी पुकार ऐसी हो कि आत्मा में वह प्रभु उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायें, हमारा मार्गदर्शन करने लगें। वह हमें समझाएँ कि हम भजन कैसे करें? उस समय साधक का उठना-बैठना, चलना-सोना, खाना– सबकुछ भगवान अपने हाथ में ले लेते हैं। छोटे बच्चे का मार्गदर्शन जिस प्रकार अभिभावक करते हैं उससे भी कहीं अधिक भगवान करते हैं। आत्मा में यह जागृति जिस क्षण से होती है उस दिन से भजन जागृत हो जाता है। यह जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष से ही सम्भव है। इसीलिये पूज्य महाराज जी का कहना था– भजन-साधन न तो वाणी से कहने में आता है और न लिखने में आता है। कबीर इसी स्थिति के सन्त थे। उन्होंने एक पद में सम्बोधित किया–
गये हजारों लोग चितचोर चाह तेरी करते करते।
पर न मिला दीदार कूच कर गये ध्यान धरते धरते।।
हजारों लोग चाह करते-करते, आहें भरते-भरते चले गये किन्तु उन्हें भगवान का साक्षात् नहीं हुआ। उनकी साधना कैसी थी?–
पंडित कवि कोविद रहे अनजान शास्त्र पढ़ते पढ़ते।
बेद पुरान कुरान हुए हैरान बयां करते करते।।
पर न मिला…..।।
कोई कहे हम पक्के हिन्दू शिखा सूत्र धारण करते।
कोई कहे हम मुसलमान दाढ़ी पर अकड़े फिरते।।
आपस में दोउ लड़कर मर गये राग द्वेष करते करते।
पर न मिला…..।।
कोई पण्डित, कोई कवि, कोई प्रकाण्ड विद्वान् हो गये; शास्त्रों को पढ़ डाला लेकिन अनजान ही रह गये। वेद, पुराण, कुरान उस परमेश्वर का वर्णन करते-करते हैरान हो गये। किसी-किसी ने अपने को हिन्दू कहा और धर्म का परिचय दिया कि यह शिखासूत्र देखो! कोई कहता है– हम पक्के मुसलमान हैं, हमारी दाढ़ी देखो! ये दोनों आपस में लड़कर मर गये। इन्हें ढू़ँढना था भगवान को, यह आपस में ही संघर्ष कर बैठे। इन्हें भी परमात्मा का दर्शन नहीं हुआ। फिर परमात्मा मिलेगा कैसे?–
सतगुर की जब दया हुई, अनेक जन्म साधन करते।
लखा दिया एक पल में, जिसे चार वेद वर्णन करते।।
सद्गुरु की उपलब्धि कई जन्मों की साधना का परिणाम है। अनेक जन्मों की साधना के फलस्वरूप जहाँ सद्गुरु मिले, एक ही पल में साधना जागृत हो गयी। ज्योंही महापुरुष का दर्शन हुआ, श्रद्धा की डोर लगी, यदि सद्गुरु हैं तो साधना तुरन्त आपके हृदय में जागृत हो जायेगी। जब भजन जागृत हो जाता है तभी समझ में आता है कि मैं ध्यान कैसे धरूँ? किसी डकैत या कत्ल करनेवाले का आप ध्यान धरें, चार दिन में ही आप में भी वैसे ही भाव उदय होने लगेंगे। यदि आप किसी कामी का ध्यान धरते हैं तो वासनाओं का वातावरण आपके मस्तिष्क में छा जायेगा। इसीलिये परमतत्त्व जिन्हें विदित है, जिनके लिए शरीर केवल रहने का मकान मात्र है, जो स्वरूपस्थ हैं ऐसे सद्गुरु से साधना जागृत होने और उन्हीं महापुरुष का ध्यान धरने का विधान है। सन्त कबीर अपना संस्मरण सुनाते हैं–
पाछे लागा जाइथा, लोक वेद के साथ।
आगे थै सतगुरु मिल्या, दीपक दीन्हा हाथ।।
हम धर्म के प्रत्याशी अवश्य थे, इसीलिये हम लोकरीति और वेदरीति के पीछे भाग रहे थे। पूरी भीड़ जा रही थी, मैं भी उन्हीं के साथ भागा जा रहा था। कबीर कहते हैं– मैं भी उसी रास्ते में था; किन्तु आगे से सद्गुरु मिल गये। उन्होंने मेरे हाथ में दीपक पकड़ा दिया कि इससे रास्ता दिखेगा! वह सद्गुरुओं का दीपक कैसा है?–
दीपक दीन्हा हाथ में, वस्तू दई लखाय।
कोटि जनम का पन्थ था, पल में पहुँचा आय।।
वस्तु का अर्थ सामग्री नहीं! सृष्टि में जो कुछ है नश्वर है। सत्य है, शाश्वत है, नित्य है तो केवल आत्मा।
सत्य वस्तु है आतमा, मिथ्या जगत पसार।
नित्यानित्य विवेकिया, लीजै बात विचार।। (बारहमासी)
शाश्वत, सत्य, नित्य, सनातन, काल से अतीत, अविनाशी पुरुष केवल आत्मा है। जगत् का पट-प्रसार नश्वर है। यह आज है तो कल नहीं रहेगा। यह पानी के बुलबुले की तरह बनता-फूटता ही रहता है। इसलिये सद्गुरु ने जब हाथ में दीपक दिया तो सत्य वस्तु को दिखा दिया, आत्मतत्त्व का साक्षात् करा दिया। इसे लोग करोड़ों जन्मों में प्राप्त कर पाते हैं लेकिन यदि सद्गुरु उपलब्ध हो गया तो ‘पल में पहुँचा आय’।
इसी ध्यान पर सन्त कबीर का यह भजन है– ‘जाड़न मरो सारी रात।’ वस्तुत: परमतत्त्व परमात्मा एक ऐसा धरातल है जहाँ शोक नहीं, मोह नहीं, सन्देह नहीं, जन्म नहीं, मृत्यु नहीं। वहाँ संसार की शीतलहरियाँ पहुँचती ही नहीं; संयोग-वियोग की लहरें वहाँ पहुँचती ही नहीं। उसी नित्य और शाश्वत धाम में अपनी स्थिति व्यक्त करते हुए वह कहते हैं–
हम झिनवा ओढ़िन।
जाड़त मरो सारी रात रे! हम झिनवा ओढ़िन।।
पहले दही जमा ले बन्दे, पीछे दुहिये गाय।
बछड़ा वाके पेट में, अरु माखन हाट बिकाय।।
रे हम झिनवा…..
चिंउँटी चली आपने नैहर, नौ मन तेल लगाय।
हस्ती मार बगल तर दाबिन, ऊँट लियो लटकाय।।
रे हम झिनवा…..
एक चींटी के मूतले सन्तो, नदी नार बह जाय।
बड़े बड़े पण्डित गोता मारैं, केवट नाव चलाय।।
रे हम झिनवा…..
सास कुँआरी बहू लड़कोरी ननद दरेरा खाय।
देखनहारहिं के बेटवा भइले, लिये परोसिन जाय।।
रे हम झिनवा…..
कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह पद है निरबान।
जो या पद का अर्थ विचारे, सोई संत सुजान।।
रे हम झिनवा…..
सबका जाड़ा तो रजाई ओढ़ने से जाता है, लेकिन कबीर कहते हैं– हमने तो झिनवा, बहुत झीना कपड़ा मलमल ओढ़ लिया और जाड़े से मुक्त हो गये और जिसने नहीं ओढ़ा वह जाड़े से सारी रात मरता रहा। वास्तव में जो पुस्तक के शीर्षक में होता है उसी का विस्तार उसकी पंक्तियों में होता है। कबीर का यह मौलिक साधनापरक पद है। भाषाविदों ने इसे यह कहकर टाल दिया कि यह तो कबीर की उलटवाँसी है। उलटवाँसी का आशय लोग लेते हैं कि जिसमें विरोधाभासी उक्तियाँ हों, जिसके बहुत से अर्थ हों। आप जो अर्थ कहें वह सही और हम अन्यथा कहें वह भी सही!– यह कोई अर्थ हुआ? अर्थ उसे कहते हैं जो हमें सम्पूर्ण अनर्थों से बचा ले और प्रशस्त पथ पर खड़ा कर दे। कबीर एक महापुरुष थे, कोई भाँड़ तो थे नहीं कि लोक रिझाने के लिये अनर्गल कविताएँ रचते फिरे। महापुरुषों के पास इतना समय कहाँ है। हँसी-विनोद के लिए भी उनके पास समय ही कहाँ है। क्योंकि–
हँसी खुशी सन्न्यासी खोवै, सधुवै खोवै दासी।
आलस्य नींद किसाने खोवै, चोरहिं खोवै खाँसी।।
कबीर पूर्ण महापुरुष थे। वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि, सूर, तुलसी, नानक इत्यादि महापुरुष, जैसा कि अनादिकाल से होते आये हैं उन्हीं की परम्परा में सन्त थे। उस वैदिक तत्त्व को, साधना की गहराइयों को उन्होंने छिपाकर प्रस्तुत किया जिससे साधक लोग ग्रहण कर लें और पथ पर चलें तथा अनधिकारी उसका दुरुपयोग न कर सकें। इसी सन्दर्भ में कबीर कहते हैं–
जाड़न मरो सारी रात।
पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने से रात-दिन होता ही रहता है; किन्तु कबीर का आशय इस रात्रि से नहीं है। आध्यात्मिक परिवेश में यह संसार ही रात्रि के तुल्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९)
अर्जुन! इस जगत्-रूपी रात्रि में सारा जीव-जगत् निश्चेष्ट पड़ा है किन्तु संयमी पुरुष इसमें जग जाता है। ज्यों-का-त्यों यही आशय गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में-
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, २/९२/२-३)
मोहरूपी रात्रि में सभी लोग सो रहे हैं। लोग रात-दिन जो दौड़-धूप करते हैं मात्र स्वप्न देखते हैं। इस जगत्-रूपी रात्रि में योगी जग जाते हैं। वही कबीर कहते हैं– ‘जाड़न मरो सारी रात! हम झिनवा ओढ़िन।’– हमने तो झीनी ब्रह्म-चदरिया ओढ़ ली। झीना अर्थात् सूक्ष्म, बारीक! ब्रह्म झीना है। वह कण-कण में व्याप्त है। वह सूर्य-चन्द्र, पृथ्वी-पाताल, जड़-चेतन, लोहे-पत्थर की ठोस चट्टानों में अविरल प्रवाहित है। जहाँ वह प्रभु नहीं है वहाँ सृष्टि नहीं है। वह जीवनीशक्ति के रूप में सर्वत्र प्रवाहित है किन्तु दिखायी नहीं देता। वह इतना झीना है कि सबके आर-पार वही है लेकिन दिखायी नहीं देता। आज तक कोई यंत्र बना ही नहीं कि उसको ढूँढ़ ले।
पानीहू से पातरा, आसमान से झीन।
पवनहू से उतावला, दोस्त कबीरा कीन।।
भगवान हैं कैसे? पानी से भी पतले; आकाश से भी सूक्ष्म, व्यापक! द्रुत गति से चलने का उदाहरण वायुवेग से दिया जाता है। कबीर कहते हैं कि यह तो कुछ भी नहीं है। पवन से भी अनन्त गुना उतावला, सर्वत्र व्याप्त को कबीर ने दोस्त बना लिया। वह है एक परब्रह्म परमात्मा हरि! वह इतना सूक्ष्म है कि सर्वत्र व्याप्त है फिर भी दिखायी नहीं पड़ता; क्योंकि वह अचिन्त्य है, अगोचर है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है तब तक वह है तो, लेकिन आपके दर्शन, स्पर्श और स्थिति के लिए नहीं है। इसीलिए महापुरुष लोग शान्त एकान्त में बैठकर इस चित्त का ही निरोध करने में प्रवृत्त होते हैं और निरोध कर लेते हैं। हमने उस अति सूक्ष्म ब्रह्म चदरिया को कवच के रूप में ओढ़ लिया। उस परमात्मा के अंतराल में हमने स्थान पा लिया जो अति सूक्ष्म है, झीना है। संसार के संयोग-वियोग की शीतलहरी वहाँ नहीं पहुँचती। तुम मरो! तो क्या सब मरते ही रहेंगे? कबीर कहते हैं– नहीं! ‘सारी रात’– जब तक रात्रि और रात्रि की परिधि है तब तक किसी-न-किसी रूप में जाड़ारूपी सन्ताप भोगना ही पड़ेगा।
प्रश्न उठता है– आपने उस झिनवे को कैसे प्राप्त कर लिया? उसका तरीका क्या है? संत कबीर कहते हैं–
पहले दही जमा ले बन्दे पीछे दुहिये गाय।
पहले ध्यानरूपी दही को जमा लें। चित्त विचारों की लहर है। यह सदैव हिलता-डुलता रहता है, सन्न-सन्न भागता रहता है, वायुवेग से गतिशील है। बहुत से लोगों को रात दो-दो बजे तक नींद नहीं आती, नींद की दवा खाकर सोते हैं। चित्त के अन्दर एक उद्वेग पैदा हो जाता है। अनुकूल वातावरण में चित्त प्रफुल्लित तो प्रतिकूल वातावरण में आँसू दिखायी देता है। इस भागदौड़ करनेवाले अशान्त चित्त को सब ओर से समेटकर पहले ध्यानरूपी दही जमा लें। दही तो दूध का जमता है, पानी का नहीं। ‘संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।’ (मानस, १/६)– वे सन्त हंस हैं जो ईश्वरीय गुणरूपी दूध को ग्रहण कर लेते हैं और विकाररूपी वारि का त्याग कर देते हैं। इस ईश्वरप्राप्ति की जो साधना है उन ईश्वरीय गुणधर्मों को पहले ग्रहण करें। गुणों के आ जाने पर उनके द्वारा अभ्यास करें और चित्त को अचल स्थिर खड़ा कर दें, पहले ध्यानरूपी दही जमा लें।
‘पीछे दुहिये गाय’– जहाँ ध्यान की स्थिति बँधी तहाँ इन्हीं गो माने मनसहित इन्द्रियों के अन्तराल से ब्रह्मपीयूष फूट पड़ेगा। परमात्मा कैसे कण-कण में व्याप्त हैं? कैसे सर्वत्र सहायता करता है? कैसे उठाता-बैठाता, चलाता-फिराता, संचालन और मार्गदर्शन करता है?– इस प्रकार प्रभु अपनी विभूतियों का चित्रण करने लगते हैं। जब तक ध्यान में भगवान नहीं आते इन्द्रियों का सर्वथा निरोध अपने बल से असम्भव है। बिना ध्यान के इन्द्रियाँ रुकती ही नहीं– ‘तुलसिदास बस होहिं तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजै।’
बछड़ा वाके पेट में, अरु माखन हाट बिकाय।
रे हम झिनवा…
ध्यान में जहाँ जमावट आयी, हृदय में इष्ट का स्वरूप आया तो ‘बछड़ा वाके पेट में’ अर्थात् वह प्रेमास्पद प्रभु, वह ब्रह्म हृदय में प्रकट हो जाता है। जहाँ हृदय में स्वरूप आया तो महिमारूपी माखन हाट-बाजार में बिकने लगता है कि महात्मा बड़े अच्छे हैं, लगता है सिद्धपुरुष हैं, उनकी वाणी में ओज है, उन्होंने कहा तो कुछ नहीं किन्तु उनके पास जाते ही हमारा वह कार्य सिद्ध हो गया।– कबीर जब इस स्थिति में आये तो लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गये। कबीर इन लोगों पर बिगड़े–
कबिरा कबिरा क्या करे, सोधो सकल शरीर।
आशा तृष्णा बस करे, सोई दास कबीर।।
‘कबीर महात्मा! कबीर अच्छे! कबीर महापुरुष!’– क्या व्यर्थ की रट लगाये पड़े हो। ‘सोधो सकल शरीर’– सकल शरीर माने कई शरीर! इन सबकी शोध करो! एक तो छिति, जल, पावक, गगन, समीर– पंचभूतों से निर्मित आपका स्थूल शरीर, यह पिण्ड! इसके अन्तराल में एक सूक्ष्म शरीर है जो मन का संसार है। इसके भी अन्तराल में कारण शरीर है। यह परमात्मा ही वह प्रशक्ति है जिसके द्वारा यह जीवनीशक्ति प्रवाहित है। आप क्रमश: इन तीनों शरीरों की शोध प्राप्त करें; किन्तु आशा और तृष्णा के रहते यह शोध पूर्ण नहीं होती इसलिये ‘आशा तृष्णा बस करे, सोई दास कबीर।’– इतना हमने किया है, इतना आप भी कर लें तो आप भी कबीर हैं। कबीर एक स्थिति है। कबीर व्यक्ति का नाम नहीं है। ‘कायेषु वीर स कबीर।’– जो शरीरों पर विजय प्राप्त कर चुका है वही कबीर है। अर्थात् गो-दोहनवाली विभूति प्राप्त करने का अधिकार सबको है।
एक महापुरुष हुए हैं– दत्तात्रेय! सती अनसूया और अत्रि महाराज के औरस पुत्र भगवान दत्तात्रेय! वह विलक्षण सन्त थे। वह पागल, उन्मत्त और विक्षिप्त की तरह संसार में विचरण किया करते थे। किसी ने उन्हें कुछ दे दिया तो खा लिया, बहता पानी पी लिया। दो-चार उपवास उनके जीवन में आये दिन की घटना थी। जब उनके चतुर्दिक अनायास ही भीड़ लगने लगी तो उन्होंने भगवान से पूछा– ‘‘प्रभो! हमें तो कोई नहीं जानता था। यह व्यर्थ की भीड़ क्यों है?’’ भगवान ने बताया– ‘‘ऐसा है, तुम्हारे हृदय में अब मैं आ गया हूँ इसलिये लक्ष्मीजी तुम्हारी सेवा करना चाहती हैं।’’ दत्तात्रेय ने कहा– ‘‘प्रभो! लक्ष्मीजी को विदा कर दें। हमने तो इन्हें कभी याद भी नहीं किया फिर क्यों चली आयीं? उन्हें विदा कर दें और आप मेरे हृदय में बने रहें।’’
भगवान ने कहा– ‘‘नहीं, मेरा चरण छोड़कर उन्हें कहीं ठिकाना भी तो नहीं है। जहाँ मैं रहूँगा वहाँ लक्ष्मीजी अवश्य सेवा में रहेंगी।’’ दत्तात्रेय भागने लगे कि यहाँ तो भीड़ है, चलें दूसरी जगह! जहाँ वह विचार बनाते कि वहाँ जायेंगे, लक्ष्मीजी संकल्प के आधार पर वहाँ पहले से ही व्यवस्था कर देतीं। दत्त वहाँ बाद में पहुँचते, व्यवस्था पहले पहुँच जाती थी। अब दत्त भगवान ने संकल्प से विपरीत दिशा में जाना आरम्भ किया। वह संकल्प करते कि पूरब जायेंगे और पश्चिम निकल जाते। इससे दो-एक दिन तो शान्ति रहती किन्तु लक्ष्मीजी वहाँ भी उपस्थित हो जातीं। फिर वही फूल-पत्ती और प्रार्थना करनेवालों की भीड़! जब वह अत्यन्त विकल होने लगे तो भगवान ने कहा– ‘‘देखो, अब यह होना ही है। अब यह तुम्हारे लिये माया नहीं है। यह मेरी इच्छा है। अब कहीं बैठ जाओ।’’ भगवान का आदेश हो गया।
दत्तात्रेय के मन में यह भाव आया कि देखें लक्ष्मीजी कैसे सेवा करती हैं? वह घूमते हुए रहने का स्थान ढूँढ़ने लगे। घूमते-घूमते उन्हें गिरनार नामक विशाल पर्वत दिखायी पड़ा। समुद्र से लगभग तीन हजार फीट की ऊँचाई तक वह चढ़ते चले गये। बब्बर शेरों से भरा-पूरा जंगल! शिखर पर उन्हें एक झरना दिखायी पड़ा। उन्होंने वहीं अपना त्रिशूल गाड़ा और बैठ गये। जूनागढ़ इत्यादि गाँव वहाँ से तीसों किलोमीटर दूर थे। पर्वत शिखर पर दत्त भगवान के बैठते ही दूरदराज के गाँववालों को स्वप्न दिखायी पड़ने लगा कि इस पहाड़ की चोटी पर कोई महापुरुष बैठे हैं। दूसरे ने कहा– हाँ, हमें दिखायी पड़ा है कि वहाँ एक झरना भी बह रहा है। तीसरे ने कहा– स्वप्न में ही हमने फल रखा, प्रणाम किया तो उन्होंने आशीर्वाद दिया। चौथे ने कहा– उन्हें हमने देखा, तीन शिर हैं। जब पाँच-सात लोगों को एक-जैसा स्वप्न मिला तो कुतूहलवश लोग पहाड़ पर चढ़ गये। वह महापुरुष वास्तव में वहाँ बैठे थे। ग्यारह हजार सीढ़ियाँ बनाकर सम्पूर्ण समाज चढ़ गया। गिरनारी टिक्कड़ आज भी वहाँ प्रसाद मिलता है।
एक महाराजा दत्त भगवान का दर्शन करने आये। उन्होंने एक ताम्रपत्र पर लिखकर अपना राज्य धूने पर चढ़ा दिया। उन महापुरुष ने कहा– ‘‘यह क्या है?’’ राजा ने कहा– ‘‘भगवन्! हमने अपना स्टेट आपको अर्पित कर दिया।’’ दत्त भगवान ने कहा– ‘‘पगले! स्टेट लेकर हम क्या करेंगे? हम तो हैं सन्त!’’ राजा ने कहा– ‘‘भगवन्! यह राजपूत अब अपने संकल्प से पीछे नहीं हट सकता।’’ दत्त ने पूछा– ‘‘सेवा करोगे?’’ राजा ने कहा– ‘‘हुक्म करें तो शीश दे दूँ।’’ दत्त ने कहा– ‘‘शीश ही दे दोगे तो सेवा कौन करेगा! ऐसा करो, आज से तुम हमारे दीवान बनकर शासन का संचालन करो। कोई गड़बड़ी न होने पाये।’’ वह राजा आजीवन तख्त के नीचे फर्श पर बैठकर दीवान की पगड़ी बाँधकर सेवा करता रहा। उसके सन्तोष के लिये एकाध बार दत्त भगवान भी वहाँ गये। अस्तु,
जहाँ लक्ष्मी झाड़ू देत हैं, शंभु करें कोतवाली।
जहवाँ ब्रह्मा भये टहलुआ, विष्णु करें रखवाली।।
तवन घर चेतिहे रे भाई!
तोहरा आवागमन मिट जाई। तवन घर……।
भगवान आते हैं तो उनकी विभूतियाँ भी आ जाती हैं। यही है ‘बछड़ा वाके पेट में’– ब्रह्म ध्यान की स्थिति में हृदय में अवतरित हो गया। अब ‘माखन हाट बिकाय’– महिमारूपी मक्खन हाट-बाजार में बिकने लगता है। अगले पद में कहते हैं,
चिंउँटी चली आपने नैहर, नौ मन तेल लगाय।
मन माप-तौल की एक प्राचीन इकाई थी। कहीं सोलह सेर तो कहीं चालीस सेर का मन होता था। सेर भी प्राचीन इकाई है। यह आजकल के एक किलोग्राम के लगभग था। नौ मन तेल में तो इस क्षेत्र की सारी चींटियाँ डूब जायेंगी। एक चींटी अपने नैहर चली, उद्गम की ओर चली। कहीं चींटी के भी नैहर होता है? वास्तव में यह योग के सन्दर्भ में कहा जा रहा है। योगी के स्थिर चित्त को इन महापुरुष ने चींटी की संज्ञा दी है।
भक्त प्रह्लाद की कथा प्रसिद्ध ही है। उसके पिता हिरण्यकश्यप ने एक स्तम्भ गर्म कराया और तलवार निकालकर पूछा– तेरा राम कहाँ है? क्या इस खम्भे में भी है? इसे छुओ! प्रह्लाद बच्चा ही तो था। वह थोड़ा हिचका। उसने देखा– एक चींटी खम्भे पर चढ़ उतर रही है। उसने कहा– ‘मुझमें तुझमें खड्ग खंभ में, घट–घट ब्यापी राम।’ उसने खम्भा छू दिया। जहाँ छूना था कि खम्भे से भगवान प्रकट हो गये। हिरण्यकश्यप मारा गया। भक्ति की लहर फैल गई।
यह कथानक भी एक आध्यात्मिक रूपक है। हिरण्याक्ष है सुवर्णमयी दृष्टि, हिरण्यमयी प्रकृति। यह त्रय तापों की ज्वाला से जीवों को दग्ध करती रहती है। किन्तु जब भगवान सम्मुख हो जाते हैं त्रय तापों की ज्वाला शान्त हो जाती है– ‘ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणम्’ (गीता, ४/१९)। उस समय चित्त इतना सूक्ष्म हो जाता है जितना बारीकवाली चिंउँटी। स्वाँस ही स्तम्भ है। जहाँ निरुद्ध स्वर पर आने-जाने की क्षमता आयी, इसी निरुद्ध स्वर की आड़ में छिपी सत्ता का नाम है परमात्मा, वह प्रकट हो जाते हैं। प्रेमी भक्त प्रह्लाद का उद्धार हो जाता है। इस प्रकार महापुरुष निरुद्ध चित्त को चींटी की संज्ञा देते रहे हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं– चित्त तो इतना बड़ा है जितना बड़ा संसार;
तुलसिदास कह चिद–बिलास जग बूझत बूझत बूझै। (विनय-पत्रिका, १२४)
लेकिन अभ्यास करते-करते ही यह समझ में आता है। चित्त है तो इतना बड़ा लेकिन ध्यानरूपी दही जिस क्षण जमा उसी समय चित्त सिमटकर इतना बारीक हो जाता है जितना बारीकवाली चिंउँटी! ऐसा संयत चित्त अपने निर्गुण स्वरूपरूपी नैहर की ओर चला।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता, १५/६)– अर्जुन! यह जीवात्मा मेरा विशुद्ध अंश है। ‘पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।’ (गीता, ९/१७)– मैं ही भरण-पोषण करनेवाला पिता और जन्म देनेवाली माता हूँ। मानस में है कि ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी।’ (मानस, ७/११६/२)– उस परमात्मा का विशुद्ध अंश यह जीवात्मा; लेकिन चित्त जहाँ ध्यान में परिणत हुआ तो इतना सूक्ष्म हो गया जितना बारीक वाली चिंउँटी। ऐसा निरुद्ध चित्त अपने उद्गम की ओर, स्वरूप की ओर चला। जिसकी हम सब सन्तान हैं उस परमपिता परमात्मा की ओर, नैहर की ओर चला।
नैहर जाते समय कुछ शृंगार चाहिए, तो ‘नौ मन तेल लगाय’– मनसहित ‘नवद्वार पुरे देही’ इनमें त्यागरूपी तेल लगाकर चला। उस समय त्याग का अहंकार स्वाभाविक है कि मैं ज्ञानी हूँ, ध्यानी हूँ, अनुभवी हूँ, सर्वज्ञ हूँ – यह है हस्ती। हस्ती अर्थात् अपनी क्षमता। यदि इनके प्रदर्शन में साधक उलझ गया, इन्हीं में सन्तुष्ट हो गया तो भगवान नहीं मिलेंगे इसलिए ‘हस्ती मार बगल तर दाबिन’– उस समय ज्ञानी-ध्यानी होने के अहं को मारकर, उसको मिटाकर साधक बगल कर देता है। ‘ऊँट लियो लटकाय’– यदि मन हस्ती अर्थात् अपनी शक्तियों का भान नहीं करता तो रहा कहाँ? ऊँट उर का प्रतीक है। उसने अपने उर के अन्तराल में लौ लगा लिया। ऐसे स्थिरचित्त योगी की महिमा पर प्रकाश डालते हैं–
एक चिंउँटी के मूतले सन्तो, नदी नार बह जाय।
ऐसे स्थिरचित्त योगी के मुँहतले अर्थात् मुख से जो वाणी निकलती है उससे ‘नदी नार बह जाय’– वेद, पुरान, गीता, भागवत आप्तपुरुषों की वाणी बन जाते हैं। क्यों? निरुद्ध चित्त तो शान्त, सम, स्थिर है। वह तो संकल्प ही नहीं करता। इसलिये उस महापुरुष से परमात्मा की अपौरुषेय वाणी प्रसारित होती रहती है। भगवान आगे की व्यवस्था देते हैं। साधक का कर्त्तव्य मात्र इतना है कि जो अपौरुषेय वाणी उतर रही है उसे ग्रहण करना और व्यक्त करना। उस समय उसकी बुद्धि मात्र यन्त्र होती है। बोलनेवाले तो भगवान स्वयं हैं। यही कारण है कि वेद अपौरुषेय है, परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है जबकि बोलनेवाले सौ-सवा सौ महापुरुष ही हैं। वे आत्मतृप्त, आत्मस्थित थे। इन्हीं की ओर संकेत करते हुए सन्त कबीर कहते हैं कि इनके मूतले (मुँहतले) जो शब्द निकलता है वह नदी-नाला जैसे बह निकलता है जिसमें ‘बड़े–बड़े पंडित गोता मारै’। उनकी वाणी को समझने की क्षमता सबमें नहीं हो सकती। ‘पंडित’– उस पथ के ज्ञाता उसमें डुबकियाँ लगाते रहते हैं कि इस वाणी का अर्थ यह नहीं, ऐसा भी हो सकता है और जहाँ उनकी समझ ने काम किया तो ‘केवट नाव चलाय’– कर्त्तव्यरूपी केवट नियमरूपी नौका का आश्रय लेकर भवसिन्धु में तैर चलते हैं अर्थात् संसार से पार होने की कोई युक्ति है तो उन आप्तपुरुषों की वाणी है। अन्त में सन्त कबीर कहते हैं–
सास कुँआरी बहू लड़कोरी, ननद दरेरा खाय।
सास कुमारी है, अभी उसका विवाह ही नहीं हुआ! ईश्वरपथ में स्वाँस ही सास है। अनन्त योनियों की रील इसके अन्दर प्रसुप्त है। जब जिसका क्रम आता है यह सम्बन्ध जोड़ती रहती है। यह स्वाँस सृष्टि के समस्त संस्कारों का लेखा-जोखा रखकर खड़ी है। लेकिन ध्यान का सतत अभ्यास करते-करते जब ध्यान की स्थिति बँधी निरुद्ध चित्त भी उद्गम, अपने अंशी की ओर ‘नैहर’ चला। अब उसका अपना निर्णय नहीं; परमात्मा प्रसारित होने लगा। चिन्तन की इस स्थिति में स्वाँस विकारों से उपराम हो जाती है। ‘कु’ कहते हैं दूषित को और ‘अर’ कहते हैं काटने को, मारने को! अब तक जो स्वाँस विकारों में प्रवाहित थी, ध्यान में भली प्रकार जमावट आने से वह विकारों से ऊपर ‘ऊर्ध्वरेता’ स्थिति में प्रवाहित हो जाती है। स्वाँस दूषित प्रवृत्तियों को काटकर एक परमात्मा में प्रवाहित हो जाती है उस समय ‘बहू लड़कोरी’– भाव ही बहू है। भाविक के हृदय में वह लक्ष्य उतर आता है। ‘ननद दरेरा खाय’– नेह आनन्द ही ननद है।
नेह निभाया ही सरे, छोड़े सरे न आन।
तन दे धन दे शीश दे, नेह न दीजै जान।।
नेह अर्थात् स्नेह! इसका निर्वाह करने पर ही मुक्ति सम्भव है, आपकी कार्यसिद्धि सम्भव है, इसे छोड़ने से कदापि नहीं; न ही किसी अन्य तरीके से सफलता मिल सकती है। इसलिये तन देना पड़े, धन देना पड़े अथवा शीश ही क्यों न देना पड़े, दे दें किन्तु ‘नेह न दीजै जान।’ माता मीरा का कहना था कि इतना कुछ देना पड़े तो दे दें किन्तु स्नेह को बचा लें; आपको सफलता मिलेगी, कार्यसिद्धि होगी, आप स्वरूप पा जायेंगे। ‘ननद दरेरा खाय’– स्नेह में प्रवाहित नियम ही ननद है। जब स्वाँस विकारों से उपराम ऊर्ध्वरेता प्रवाहित है, जिस प्रभु की चाह थी वह भाविक के हृदय में उतर आया तो स्पष्ट है कि अब आगे विकास की आवश्यकता शेष नहीं है। आगे नियम करने की आवश्यकता नहीं रही। इसके साथ ही,
देखनहारहिं बेटवा भइले, लिये परोसिन जाय।
रे हम झिनवा ओढ़िन।
इस स्थिति को देखनेवाला कौन है? वही भक्त साधक! वह स्वयं ही ब्रह्म के रूप में परिवर्तित हो गया– ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ भगवन्! आपकी कृपा से कोई-कोई आपको पाता है। जब वह पाता है तो भगवान हैं कैसे? गोस्वामी तुलसीदासजी एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं–
सुरसरि मिले सो पावन कैसे।
ईस अनीसहिं अंतर तैसे।। (मानस)
जैसे एक बूँद जल को गंगा से स्पर्श करा दिया जाय तो गंगा नाम रहेगा या बूँद? बूँद की मात्रा कम थी। वह मिट गयी। गंगा का आयतन अधिक होने से उसी का प्रवाह सबके सामने है। इसी प्रकार जीवात्मा ईश्वर का अविनाशी अंश है। इस ध्यान-क्रिया के द्वारा सतत उत्थान होते-होते जहाँ मूल परमात्मा विदित हुआ, अंश जो स्वल्प था उसी में विलीन हो गया और बृहद् ब्रह्म, व्यापक परमात्मा शेष बच रहा। इसलिये कहा जाता है कि प्रभु जब अपनाते हैं तो अपने ही स्वरूप में भक्त को ढाल लेते हैं। प्राप्ति के पश्चात् भी यदि हम अलग और भगवान अलग हैं तब तो भक्त बेचारा जीव का जीव रह गया। इसलिए ‘देखनहारहिं बेटवा भइले’– देखनेवाला ही दर्शन और स्पर्श के साथ स्वरूप में स्थित हो गया। वह ब्रह्म के स्वरूप में परिवर्तित हो गया। अब सेवक खो गया और स्वामी ही शेष बचा। इस अवस्था में भजन किस श्रेणी का होता है? इस पर कहते हैं– ‘लिये परोसिन जाय’– उस समय भजन परावाणी के स्तर का रहता है; किन्तु इस अवस्था का बोध कराकर परावाणी भी क्षीण हो जाया करती है। अब ‘भजन हमार हरि करें, हम पायो विश्राम।’– हम तो पेंशनियर हो गये। ईश्वर-पथ में एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है। उसमें सर्वोपरि चिंतन-क्रम परावाणी का है। जो श्वास का भजन नहीं जानता ऐसे साधुओं को महापुरुष अपनी कुटिया में दो रोटी भी नहीं देते थे; क्योंकि वह स्वयं तो गुमराह है और घूम-घूमकर लोगों को गुमराह ही तो करेगा। भजन और नाम-जप का उतार-चढ़ाव, चिन्तन का उतार-चढ़ाव श्वास पर है।
एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। बैखरी उसे कहते हैं जो व्यक्त हो जाय। जैसे– ‘ओम्-ओम्’ या ‘राम-राम’ का उच्चारण इस ढंग से करें कि सबको सुनायी पड़े। इसका अभ्यास करते-करते जब मन में और अधिक क्षमता आ गयी तब मध्यमा अर्थात् धीरे-धीरे जपना! यह उच्चारण कण्ठ से किया जाता है। एकान्त में शान्त बैठकर कण्ठ से उच्चारण करें, हल्का-सा जीभ का सहारा दें। ‘ॐ-ॐ…’– ऐसी एक रट लगा दें। उच्चारण अवश्य करें, आप सुनें भी किन्तु पास में कोई बैठा हो तो उसे न सुनायी पड़े। कभी-कभी शान्त नीरव रात्रि में झींगुर बोलता है झन्नन्नन! वह दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह मिनट तक एक धुन बाँध देता है। हम जब एकान्त में इस स्तर के भजन में बैठते थे तो झींगुर की आवाज से बड़ी प्रेरणा मिलती थी कि हमसे अच्छा तो यह भजनानन्दी है जो इतनी देर से रट लगाये पड़ा है।
मध्यमा वाणी का जप करते-करते मन में और टिकने की क्षमता आ जाने पर पश्यन्ती की अवस्था में प्रवेश मिलता है। पश्य का अर्थ है देखना। इसी से बना है विपश्यना अर्थात् विशेष रूप से देखना – चारों ओर से चित्त समेटकर स्वाँस को देखें। इस पश्यन्ती वाणी का उतार-चढ़ाव स्वाँस पर है। इसके लिये शान्त बैठ जायँ और मन को हर ओर से समेटकर स्वाँस में इस प्रकार लगायें कि कब स्वाँस अन्दर आयी, कितना रुकी, कब बाहर गयी?– इसे जानें। श्वास कितना बाहर रुकी?– उसे जानें। फिर कब अन्दर गयी?– उसे देखें? दो-चार बार इसे देखें और जब मन में यह क्षमता आ जाय तो धीरे से चिन्तन में नाम ढाल दें! अब स्वाँस अन्दर गयी तो स्वाँस में ओम्; बाहर आई तो स्वाँस में ओम् कहने की भावना करें। यदि राम जपते हैं तो स्वाँस लेते समय ‘रा’ और छोड़ते समय ‘म’ स्वाँस में कहें। जिह्वा या कण्ठ से यह नाम नहीं कहना पड़ता। जो आशय ‘ओम्’ का है वही राम का है। जिसकी जैसी रुचि हो, जपे। नाम को स्वाँस में ढाल दें। एक भी स्वाँस हमारी जानकारी के बिना बगैर नाम के बाहर व्यर्थ न जाने पाये। अभ्यास शनै:-शनै: उठने लगेगा। एक दिन ऐसा आयेगा कि ‘जपे न जपावे अपने से आवे।’– न तो आप जपें न मन को जपने के लिये बाध्य करें, एक बार सुरत लगा दिया तो ‘रिनक–धिनक धुन अपने से उठे।’– धुन प्रवाहित हो जाय– ओम्-ओम्-ओम्….. बस! स्वाँस बाँस की तरह एकदम खड़ी हो जाय, नाम के अतिरिक्त दूसरा संकल्प न आये; इस प्रकार स्वाँस तैलधारावत् एक गति से आने-जाने और नाम जपने लगेगी। आप पानी गिराते हैं तो टप-टप कम या अधिक जल गिरता है; किन्तु तेल गिरता है तो एक धारा-सी बन जाती है। इस प्रकार स्वाँस जब अचल स्थिर खड़ी हो जाय, मन की दृष्टि उसमें समाने लगे इसका नाम है परावाणी। इसी को अजपा भी कहते हैं। अजप अर्थात् न जप! हम न जपें और जाप हमारा साथ न छोड़े! यह परमतत्त्व परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाली है इसलिये इसका नाम परावाणी है। यह वाणी परमात्मा की प्राप्ति तक साथ देती है और इस वाणी का परिवर्तन अन्य वाणियों में नहीं होता।
इस परावाणी की परिपक्व अवस्था में ‘जप मरै अजपा मरै’– जप मर जाता है (इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जप करो ही न।)। जप कब मरता है? जब जप करते-करते अजपा की जागृति हो जाय तो जप अजपा में समाहित हो जाता है। इसी प्रकार अजपा भी मर जाता है। कब? जब अनहद की पकड़ आ जाय। हद कहते हैं सीमा को, अनहद कहते हैं असीम को। कोई दो-चार-छ: घण्टा भजन करता है। यहाँ बारह-बारह घंटा तक भजन करनेवाले हैं लेकिन एक सीमा निश्चित है कि चौदह घण्टा-सोलह घण्टा! एक स्तर ऐसा भी आता है कि,
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
जब तक जगें सुमिरन करते रहें, सोयें तो चरणों में लव लगाकर निद्रा-लाभ करें। सोकर उठने पर सुरत वहीं लगी मिले। जहाँ भजन धारावाही हो जाता है, माप-तौल से ऊपर आ जाता है तो यह अनहद कहलाता है। लेकिन यह स्थिति परावाणी की अवस्था में ही सम्भव है। यह अनहद भी मर जाता है। कब?–
जप मरै अजपा मरै, अनहदहू मरि जाय।
सुरति समानी सबद में, ताहि काल ना खाय।।
सुरति मन की दृष्टि का नाम है। यह मन की दृष्टि स्वाँस में शब्द देखते-देखते, शब्द में सुरत खो जाय, शब्द मात्र रह जाय, ‘ताहि काल ना खाय’– उस समय काल से अतीत, अकाल पुरुष परमात्मा जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला है कि किस प्रकार वह कण-कण में व्याप्त है, वह स्वयं आपमें दृष्टि बनकर खड़ा हो जायेगा और सामने स्वयं होकर बोध भी करा देगा।
इसी आशय को सन्त कबीर व्यक्त करते हैं– ‘देखनहारहिं बेटवा भइले’– चिंतन करते-करते स्वाँस विकारों से उपराम ऊर्ध्वरेता प्रवाहित हुई, तत्क्षण भाविक के हृदय में लक्ष्य उतर आया। उस समय नियम भरपूर अवस्था में है, प्रेमपूर्ण नियम का प्रवाहपूर्ण है– ‘ननद दरेरा खाय’। और इस स्थिति को देखनेवाला भक्त साधक – जहाँ भगवान ने दर्शन दिया तो ‘देखनहारहिं बेटवा भइले’– वह ब्रह्म के रूप में परिवर्तित हो गया। जहाँ उसका दर्शन-स्पर्श मिला, स्थिति मिल गयी। यह अवस्था परावाणी की परिपक्व अवस्था में आती है। ‘लिये परोसिन जाय’– परावाणी भी इस अवस्था का दर्शन कराकर शान्त हो जाती है। भजन करके ढूँढ़ें किसे? आगे कोई सत्ता बची ही नहीं, पीछे कोई विकार बचा ही नहीं तो मिटावें किसे? इसलिये अब परावाणी भी क्षीण हो गयी। अब,
हरिजन भजन भेद से न्यारा।
वह हरि का जन भजन और भेद से अलग हो जाता है, उसे अभेद स्थिति मिल जाती है। अन्त में यह महापुरुष कहते हैं कि वाणी सुनने या अटकल लगाने से यह स्थिति नहीं मिलती–
कहत कबीर सुनो भाई साधो! यह पद है निरबान।
कबीर कहते हैं कि साधो सुनो! यह पद निर्वाणी है, वाणी का विषय नहीं है, यह अनुभवगम्य है। भगवान आपमें दृष्टि बनकर और सामने स्वयं खड़े हों तब समझ में आता है। यह साधनापरक है। पहले आपको दही जमाना होगा, इन्हीं संयत इन्द्रियों से ब्रह्मपीयूष (ईश्वरीय अनुभूति) प्राप्त करना होगा, शनै:-शनै लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा, भगवान की अनुभूतियों का सूत्रपात् होगा। स्वाँस विकारों से उपराम होने पर तत्क्षण-प्राप्ति! यह पथ चलनेवालों, ध्यान धरनेवालों के लिये है, उनके हृदय में घटित होनेवाली घटना का चित्रण है। ‘किसी ने वाणी से समझा दिया और छात्रों ने पढ़ लिया’– इतने से काम नहीं चलेगा। आपको अभ्यास करना पड़ेगा। इसलिये ‘यह पद है निरबान’– यह वाणी का विषय नहीं है। और, ‘जो या पद का अर्थ लगावे’– इस पद में बतायी गयी जो विशेषताएँ हैं, अर्थ माने जो तथ्य है, रहस्य है जो भी अपने अपने में ढाल ले, सँजो ले, अपने को उस पर स्थिर कर ले– ‘सोई सन्त सुजान’। ‘रे हम झिनवा ओढ़िन’– वही सन्त है, वास्तविकता का ज्ञाता है। जिस झिनवे को हमने प्राप्त किया, उसने भी प्राप्त किया है।
इस विधि से हमने कण-कण में व्याप्त, पानी से पतला, आसमान से भी व्यापक, वायु से भी अनन्त गुना वेगवान् उस ब्रह्म-चदरिया को धारण कर लिया, उसके अन्तराल में हमने स्थान पा लिया जहाँ संसार और संसार से उत्पन्न संयोग-वियोग की शीतलहरियाँ नहीं पहुँचतीं; लेकिन जब तक रात्रि की सीमा में आप हैं तब तक तो इन त्रय तापों को किसी-न-किसी रूप में सहना ही पड़ेगा।
सारांशत: ईश्वर-प्राप्ति का साधन भजन है। भजन करके हम भगवान को कुछ देते नहीं। हाँ, जिस कच्चे सौदे में आप जी रहे हैं; आज हमारा जीवन है, कल की गारण्टी हम नहीं दे सकते। इस कच्चे घर को छोड़कर शाश्वत घर की प्राप्ति; इस क्षणभंगुर जीवन के स्थान पर सदा रहनेवाले जीवन की प्राप्ति, ऐसा नहीं कि आज कमाया तो कल बैंक बैलेन्स खाली, तनख्वाह से पहले ही खतम, कर्ज हो गया सेठों का; इस क्षुद्र सम्पत्ति को छोड़कर स्थिर सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए भजन किया जाता है।
अपने प्रिय सखा अर्जुन को इसी उपलब्धि की प्रेरणा भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में दिया। उपदेश के आरम्भ में उन्होंने अर्जुन को ऐसा कुछ भी नहीं बताया; क्योंकि उस समय अर्जुन अबोध था, छोटी-छोटी बातों के लिये झगड़ रहा था। जैसे-जैसे समझने की क्षमता आती गयी, अर्जुन ने चौबीस प्रश्न किये– प्रभो! आप किन-किन भावों से जानने में आते हैं? यदि ज्ञानमार्ग श्रेष्ठ है तो भयंकर कर्ममार्ग से हमें क्यों उलझाते हैं? प्रभो! पृथ्वी और स्वर्ग तक के सुख के लिये मैं युद्ध नहीं करूँगा; क्योंकि स्वर्गिक सुख में भी मैं उस उपाय को नहीं देखता जो इन्द्रियों को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। अन्तत: वह मौन हो गया। जो प्रश्न वह नहीं कर सकता था भगवान ने उसे स्वयं बताया और जब देखा कि इसमें पात्रता आ गयी, तब भगवान ने कहा–अर्जुन! जानते हो भगवान कहाँ रहते हैं? उन्होंने स्वयं बताया–
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)
अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूतों अर्थात् प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। हृदय के अंदर! इतना करीब! तब लोग ईश्वर को देखते क्यों नहीं? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! मायारूपी यन्त्र पर आरूढ़ होकर भ्रमवश सब भटकते ही रहते हैं इसलिये ईश्वर को नहीं देख पाते। जब ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? भजन किसका करें?– अगले ही श्लोक में भगवान कहते हैं–
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२)
अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ! ‘सर्वभावेन’ जाओ। ऐसा न हो कि थोड़ा-सा भाव पशुपतिनाथ में, थोड़ा-सा भाव संकटमोचन में, थोड़ा-सा भाव कामाख्या देवी में – तब तो हम रुपये में बारह आना लीक हो गये। हृदयवाले ईश्वर के हिस्से में तो केवल चार आने पड़े, इससे कल्याण नहीं होगा। इसलिये अर्जुन! सम्पूर्ण मनोयोग से, सम्पूर्ण भावों से उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ।
मान लें, हमने अपनी सारी मान्यताओं को तोड़ा और उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण चले ही गये तो लाभ क्या? भगवान कहते हैं– ‘तत्प्रसादत्परां शान्तिम्’– उसकी कृपा से तुम परमशान्ति को प्राप्त कर लोगे और ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, तुम्हारा जीवन रहेगा और तुम्हारा निवास-स्थान रहेगा। इसीलिये भजन किया जाता है। ऐसा स्थान मिलेगा जिसमें हर साल चूना नहीं पोतना पड़ेगा। आपका घर शाश्वत, आपका जीवन शाश्वत! इसी अपने सहज स्वरूप की प्राप्ति के लिये भजन किया जाता है और प्राप्तिवाला भजन ध्यान से ही सम्भव है।
जनश्रुतियों में है कि एक भगत कबीर से मन्त्र लेने गया। बहुत नाम सुन रखा था उसने। बहुत दूर से चलकर आया था वह। संयोग से वह कबीर से ही पूछ बैठा– ‘‘यह कबीर साहब कहाँ निवास करते हैं?’’ कबीर ने कहा– ‘‘होगा कहीं कबिरवा!’’ वह व्यक्ति अपने श्रद्धास्पद के लिये आदररहित सम्बोधन सहन नहीं कर सका। उसने कहा– ‘‘इतने बड़े महापुरुष को कबिरवा कहता है!’’ उसने कबीर को एक थप्पड़ मारा। कबीर साहब ने दूसरा गाल भी उसकी ओर घुमा दिया कि गलती दोनों गालों की है। उस व्यक्ति ने कहा– ‘‘बड़े निर्लज्ज हो!’’ बड़बड़ाता हुआ वह आगे बढ़ गया।
आगे बढ़ने पर उसने दायें-बायें, इधर-उधर लोगों से पूछा– भाई! यह कबीर साहब कहाँ रहते हैं? किसी ने उसे दिखाया कि वह क्या बैठे हैं कबीर साहब! तब तो उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने लौटकर कबीर साहब को साष्टांग दण्डवत् किया और कहा– ‘‘प्रभो! अनजाने ही मुझ अज्ञानी से बड़ी भूल हो गयी।’’ कबीर ने कहा– ‘‘बेटा! तुमसे तो भूल हुई ही नहीं। लोग दो पैसे की हँड़िया खरीदते हैं तो चार बार ठोंक बजा लेते हैं कि सौदा कच्चा तो नहीं है, दरार तो नहीं है। तू तो अपना तन-मन-धन सर्वस्व समर्पण करके गुरु बनाना चाहता है। थोड़ा ठोंक बजा लिया तो अच्छा ही किया।’’ कहा भी गया है कि ‘गुरु करै जानि के, पानी पीये छानि के।’, रास्ता चले देख के और ऐसा कोई कार्य न करें जो जीवन में कभी चित्त से न उतरे, सोचनीय हो जाय–
बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।
काम बिगारे आपनो, जग में होय हँसाय।।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)