सनातन-धर्म है क्या?

प्रश्नमहाराजजी! प्रबल पिपासु होने पर भी बहुतसी भ्रान्तियों में बहता रहता हूँ। वस्तुतः सनातनधर्म है क्या? कोई ऐसा रूप बताइये जिसका सभी पालन कर सकें?

उत्तर जिसे तुम भ्रान्ति कहते हो, वही अन्तिम योग्यता को क्रमशः दिलानेवाला होता है। जितने भी तीर्थ या देवी-देवता हैं, उन्हीं का अनुसन्धान ही आज तुम्हें इधर प्रेरित कर रहा है। इन्हीं के द्वारा सनातन-धर्म के लिए हम जागरूक होते हैं। अतः ये सभी सनातन-धर्म की श्रृंखला की कड़ी के रूप में हैं। हृदय में श्रद्धा व भावों को जागृत कर, पुरुषार्थ व पुण्य का कोष बनकर यही क्षमता वास्तविक लक्ष्य की दिशा प्रदान करती है। अब आइये सनातन की यथार्थ दिशा पर।

सनातन-धर्म मायिक अनिष्टों को समाप्त कर इष्ट की उपलब्धि करा देता है। क्रियात्मक दृष्टि, जो इस जीवात्मा को परमात्मा में प्रवृत्त कर दे, वही सनातन है। यह योग अथवा क्रिया की पूर्तिकाल में प्रत्यक्ष स्थिति दिलानेवाला है। सनातन कहते हैं अनादि को, जो सर्वव्यापी हो, सर्वशक्तिमान हो, जिसका नाम परब्रह्म परमात्मा है, जो अस्तित्वसहित इन्द्रियों का निरोध करके साधना की परिपक्वावस्था में स्थिति प्रत्यक्ष करानेवाला है। लोग चाहे जो भी समझें परन्तु प्रत्येक महापुरुष की रमणस्थली यही रही है। महाबीर स्वामी, जिन्हें जैनधर्म का प्रवर्तक माना जाता है, इसी धर्म की सच्ची रहनी वाले थे कि, ‘‘वह आत्मतत्त्व मैं ही हूँ।’’ बुद्ध भी इसी धर्म के पुजारी थे कि, ‘‘तथागत, मैं उस तत्त्व से अवगत हूँ, वह मुझसे भिन्न नहीं है।’’ श्री शंकराचार्य भी इसी स्तर में खड़े हुए कि, ‘‘मैं वही स्वरूप हूँ।’’ अब आप ही विचार करें कि यह भेद कैसा? यह तो उन व्यक्तियों की देन है जिन्होंने महापुरुषों का आश्रय ले उनको अपने प्रचार का माध्यम बना लिया। यह कहना तो सर्वथा भूल ही होगी कि सनातन-धर्म की नींव शंकराचार्य के द्वारा डाली गयी, तब तो वह हजार वर्ष का ही हुआ, जितनी की शंकरपर्यन्त अवधि है। जिस गीता का भाष्य शंकराचार्य ने किया, वह बौद्ध इत्यादि से भी हजारों वर्ष पुरानी है और अपना विशेष देन सनातन-धर्म को ही बतलाती है।

यदि कोई उसका जन्मदाता है तो सनातन या अनादि कैसे हो सकता है? सनातन-धर्म के नाम पर जो अच्छाइयों के स्थान पर कुछ रूढ़ियाँ आज प्रचलित हैं, वे श्रीकृष्णकाल में भी थीं। हो सकता है कि उनका कोई अन्य रूप रहा हो। सनातन-धर्म की एक प्रचलित मान्यता का स्मरण होते ही अर्जुन युद्ध की इच्छा को त्यागकर, धनुष रखते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण से कहने लगा कि, भगवन्! मैं अपने ही कुल को युद्धस्थल में पाता हूँ। पिण्डोदक क्रिया, वर्णसंकर आदि का उदाहरण देते हुए उसने कहा कि कुल-धर्म सनातन है। हमें सनातन-धर्म की रक्षा करनी चाहिए। इस युद्ध से तो सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- तुझे इस विषम स्थल में अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? जैसा कि तुम कहते हो, न कभी श्रेष्ठ पुरुषों ने इसका आचरण किया और न परम कल्याण ही करनेवाला है। तब अर्जुन विनीत भाव से योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करने लगा कि ‘शिष्यस्तेऽहम्’- मैं आपका शिष्य हूँ। मुझ शरण में आये हुए की रक्षा कीजिए। मुझ पर अनुग्रह करते हुए बताइए कि वह सत्य एवं सनातन है क्या जिससे कि मैं श्रेय को प्राप्त हो सकूँ? तब समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्य वस्तु का कभी तीनों कालों में अभाव नहीं है और असत्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है। अब प्रश्न पैदा होता है- जिसका किसी भी काल में अभाव नहीं है वह स्थिर रहनेवाला सत्य क्या है? तब श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि यह आत्मा ही परम सत्य है, यह मिटता नहीं। यह आत्मा ही सनातन है, यही शाश्वत है, यही पुरातन है और यही अजर-अमर है। वहाँ मृत्यु का प्रवेश नहीं है। जब वह आत्मा सब में है तो फिर खोजा किसको जाय? इसके उत्तर में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे अर्जुन! इस आत्मा को इन विभूतियों से युक्त तत्त्वदर्शियों ने देखा। भला वह तत्त्वदर्शिता है क्या? बाह्य दृष्टि में जैसा कि उन मान्यताओं का प्रचलन है- पाँच तत्त्व, पचीस प्रकृतियों, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और भूमिका आदि का सत्रह, पाँच, पचीस में तारतम्य बाँधकर कह देते हैं कि यही तत्त्वदर्शन है; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार तत्त्व की चाहवाले पुरुषों को चाहिए कि वे इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया समेटकर मन को ध्यान में लगावें। ध्यान का लक्ष्य वास्तविक होना चाहिए क्योंकि योग की निर्धारित क्रिया एक ही है। दीर्घकालीन अभ्यास के फलस्वरूप काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि मायिक प्रवृत्तियों का निरोध हो जाता है और शान्ति, क्षमता, एकाग्रता इत्यादि सद्-प्रवृत्तियों का अभ्युदय हो जाता है। इष्ट की एकाग्रता, लक्ष्य इत्यादि जो इष्ट को दिलानेवाले परम स्रोत हैं उनका हृदय में धारावाही प्रवाह हो जाने पर ही पराभक्ति की स्थिति आती है। इसी स्थिति में वह ब्रह्म को पूर्णतः जानता है। तत्त्व को जानता तो है; किन्तु वह तत्त्व है कैसा?

तत्त्व का स्पष्टीकरण करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं जो हूँ, जिस स्थितिवाला हूँ, जिन लक्षणों से युक्त हूँ- उसको जानता है और जानने के तत्क्षणोपरान्त उसी में लीन हो जाता है। सिद्ध हुआ कि ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम तत्त्वदर्शन है। प्राप्तिकाल में जिसको भगवान मिले हैं, उसके दूसरे क्षण ही वह अपनी आत्मा को उन्हीं भगवद्-गुणधर्मों से परिपूर्ण पाता है। जिसके लिए वे संकेत करते हैं कि वह मुझमें स्थित है और वही सनातन है। अब जिस क्रिया से वह आत्मतत्त्व प्राप्त हो जाय, उसका पालन ही सनातन-धर्म का पालन है। उस क्रिया की पूर्तिकाल में ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही इस आत्मा में परमात्मा के गुणधर्म प्रवाहित होने लगते हैं। आत्मा ब्रह्म के साथ तद्रूप हो जाती है, इसलिए यह आत्मा प्राप्तिकाल में सनातन है न कि पहले। अब बहुत से पूजा के ऐसे भी विधान पाये जाते हैं कि लोग महापुरुषों के शब्दों का सहारा लेकर यह आत्मा सनातन है, शाश्वत है, यही मेरे अन्दर है, यही मेरा स्वरूप है- ऐसा कहकर बोध लगाने लगते हैं परन्तु यह सनातन-धर्म की कोई पूजा नहीं है। जब क्रिया की पूर्तिकाल में ही वह प्रत्यक्ष होता है तो कहने से क्या लाभ?

अब यदि हमें वास्तव में सनातन-धर्म को पाना है तो सर्वप्रथम उस क्रिया को समझना होगा, जिसके द्वारा वह प्रत्यक्ष होता है। वह क्रिया किसी भी स्थितिप्राप्त महापुरुष के द्वारा हृदय में जागृत हो जाती है। केवल लिखना तो प्रेरणा मात्र है। श्रीकृष्ण ने उसको इस प्रकार बताया है कि- हे अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में आत्मा को प्रत्यक्ष करानेवाली क्रिया एक ही है। अब प्रश्न उठता है कि क्या अनेक क्रियाओं को करनेवाले भजन नहीं करते? तब कहते हैं कि वे भजन नहीं करते। अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली हुआ करती है, इसलिए बहुत-सी क्रियाओं का विस्तार कर कल्पित बुद्धि से अत्यन्त मनोरम रूप देते हुए उसको व्यक्त करते हैं। उनकी वाणी का प्रभाव जिनके चित्त पर पड़ता है उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से पूछा कि, भगवन्! हम इस ज्ञान को कैसे प्राप्त करें? तब वे कहते हैं कि हे अर्जुन! तत्त्वदर्शी, जो उस परमतत्त्व आत्मा को प्रत्यक्ष कर चुके हैं या उस तत्त्व की स्थितिवाले हैं, उनके समक्ष शुद्ध अन्तःकरण से कल्याण की कामना करते हुए, निष्कपट भाव से सेवा व प्रश्न के द्वारा उस विधि को प्राप्त कर, जिसके अन्दर ईश्वर की प्राप्ति एवं साधना की पराकाष्ठा निहित है।

अब एक नवीन समस्या सामने खड़ी हो जाती है कि जीवात्मा परमात्मा में कैसे स्थित हो? जीवात्मा और परमात्मा कोई अलग सत्ता नहीं हैं। केवल कुछ रुकावटों की वजह से जीव-ईश्वर इत्यादि के विशेषण लगते हैं। यह उन पदों के नाम हैं, जो उस अजर-अमर सत्ता के बीच में पड़े हुए हैं। जब इस मानव के विचरने का क्षेत्र अविद्या एवं अज्ञान ही जानकारी है अर्थात् अविद्या से प्रेरित हो अज्ञान को ही ज्ञान समझता है तब यही पुरुष जीवात्मा कहलाता है। जिस पुरुष के अन्तःकरण में विद्या का ही क्षेत्र है एवं ज्ञान अथवा वास्तविकता ही जिसकी जानकारी है अर्थात् विद्या से प्रेरित हो ईश्वर या परम सत्य का ही जिसे ज्ञान है, वह ईश्वरात्मा कहलाता है। विद्या-अविद्या से परे जिसका क्षेत्र एवं रहनी है और ज्ञान-अज्ञान से परे जिसकी जानकारी है, वही परमात्मा की संज्ञा से विभूषित होता है।

देखिये, आत्मा वही है। जीव एक विशेषण लग गया है इसलिए जीवात्मा की संज्ञा दी जाती है। फिर चिन्तन के द्वारा इष्ट की जानकारी की अवस्थाकाल में उसी आत्मा में एक ईश्वर विशेषण लग जाने से वह ईश्वरात्मा कहलाता है। जब साधक उसमें प्रवेश पा जाता है तो ऐसी अवस्था में वही आत्मा परमात्मा के नाम से जाना जाता है। यह सब तभी संभव है जब शनैः-शनैः चलकर अभ्यास करते हुए मन सह-अस्तित्व इन्द्रियों सहित सर्वथा निरोध की अवस्था में आ जाता है, तभी साक्षात्कार होता है। ऐसी स्थिति में ब्रह्म को जानने की क्षमता आ जाती है एवं लक्षण भी उसके जैसा ही हो जाता है। इसी स्थिति का नाम तत्त्वदर्शन है। हम चाहे देश में जन्मे हों चाहे विदेश में, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता; क्योंकि इस निर्दिष्ट क्रिया का सम्बन्ध सीधा उस परमात्मा से है, जो सबका नियन्ता है। यह देश-विदेश तो जीवन-झगड़ों से मिलनेवाले नाम हैं जो अस्थिर हैं किन्तु उस लक्ष्य की प्राप्ति के पूर्व इस दुनिया में कोई सुखी नहीं होता। लक्ष्य-प्राप्ति के लिए किसी महापुरुष का सान्निध्य परमावश्यक है, अन्यत्र तो माया का ही प्रसार है।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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