करमाँरी रेखा न्यारी-न्यारी

करमाँरी रेखा न्यारीन्यारी

पुरुष पारस होता है। जिनको आप मासूम छोटा बच्चा कहते हैं, सबलोग जिनके पालनहार होने का दावा करते हैं, वास्तविकता तो यह है कि उनका पालनहार कोई और है। सच पूछो तो अधिकांशत: वह स्वयं हैं। बहुत-से बालक ऐसे भी हैं जिनके पालनहार ही नहीं बचे। उदाहरण के लिए गोस्वामी तुलसीदासजी का ही जीवनवृत्त लें। जन्मते ही माता मर गयी। चार-छ: महीने भी नहीं गुजरे कि पिताजी भी चल बसे। पाँच वर्ष भी नहीं बीते कि देखरेख करनेवाली दासी चुनिया भी मर गयी। अब, लावारिस बच्चा! गलियों में इधर-उधर लुढ़कने लगा। किसी ने दयावश दूध पिलाया तो वही मर गया। गाँवभर कहने लगा कि यह तक्षक है। जो इसे खिलाये-पिलायेगा, यह उसी को काट खायेगा। इन्हीं विषम परिस्थितियों में वह अनाथ बालक शनै:-शनै: बड़ा होने लगा। विचार करें, उसका पालनहार कौन था? माता-पिता, अभिभावक कोई भी तो नहीं रह गये, फिर भी पालन हुआ।

एक बार एक महापुरुष की दृष्टि उन पर पड़ी। वह थे स्वामी नरहर्यानन्द जी। उन्होंने गाँववालों से पूछा– यह बालक कौन है? लोगों ने बताया– महाराज! इतना अभागा लड़का सृष्टि में शायद ही कभी जन्मा हो। बेचारा, गरीब, मनहूस, दीन-हीन, असहाय, दु:खी-दरिद्र जितनी उपाधियाँ थीं गाँववालों ने सब उसी के ऊपर लगा दिया। महात्मा दयालु थे। वह उसे अपने साथ शूकरक्षेत्र (सोरो) ले गये, रामकथा हृदयंगम कराया। काशी में शेष सनातन से वेद-वेदाङ्ग की शिक्षा दिलायी।

शिक्षा ग्रहणकर तुलसीदास जी जन्मभूमि लौट आये। परिणय-सूत्र में बँधे और नवपरिणीता वधू के साथ सुखपूर्वक जीवनयापन करने लगे। पत्नी में इतना लगाव हो चला कि वह उसे मायके जाने ही न देते। एक बार तुलसी घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी अपने भाई के साथ मायके चली गयी। तुलसी को जानकारी हुई तो वह भी ससुराल चल पड़े। रात्रि का समय था। यमुना में भयंकर बाढ़ आयी हुई थी फिर भी पत्नी का वियोग न सह पाने के कारण तुलसी नदी में तैर चले; किन्तु भँवर में फँसकर डूबने लगे। संयोग से वहीं एक लाश भी चक्कर काट रही थी। उसका सहारा लेकर तुलसी ने किसी प्रकार यमुना पार की और आधी रात होते-होते ससुराल पहुँच गये।

वहाँ चारों तरफ सन्नाटा था। मकान पर एक सर्प लटक रहा था जिसे रस्सी समझ तुलसी ऊपर चढ़ गये और पत्नी के कक्ष तक पहुँच गये। पत्नी ने पूछा– ‘‘अरे! इतनी रात! आप आये किस रास्ते से? दरवाजा किसने खोला?’’ तुलसी ने बताया– ‘‘प्रिये! तुमने रस्सी जो लटका रखी थी।’’ पत्नी ने दीपक के प्रकाश में देखा तो घबड़ा गयी; पूछा, ‘‘नदी को कैसे पार किया?’’ तुलसी ने बताया– ‘‘एक लाश मिल गयी थी। तुम्हारे प्रेम ने उसे नाव का रूप दे दिया।’’ पत्नी भले घर की थी, मानी-सम्मानी थी, बिगड़ खड़ी हुई। उसने सोचा– इन्हें यहाँ इस प्रकार आया देख लोग क्या सोचेंगे? यह कितने विषयलोलुप हैं। उसने कहा– ‘‘इस हाड़-मांस से बने पुतले में आपको जितना प्रेम है, उसका आधा भी भगवान में होता तो बेड़ा पार हो जाता। आप दो बार मरने से बचे हैं– एक बार यमुना में, दूसरी बार विषधर से। तीसरी सबसे बड़ी मृत्यु है लोकलज्जा। हम लोगों को जबाव क्या देंगे? इतना आवारा है तुम्हारा पति?’’ एक बार-दो बार तो तुलसी को कुछ सुनाई न पड़ा किन्तु तीसरी बार जब कानों में भलीप्रकार बात पड़ी कि आधा प्रेम भगवान में होता तो बेड़ा पार हो गया होता। तुलसी ने तुरन्त उस दरवाजे को प्रणाम किया, उस देवी को प्रणाम किया, ऊपर से कूदकर भाग आये। तुलसी तुलसीदास हो गये।

लीला करन चहत प्रभु जबहीं।

कारन खड़ा करत हैं तबहीं।।

भगवान जब किसी को बुलाना चाहते हैं तो ऐसा कारण खड़ा कर देते हैं कि बचकर भागने को जमीन ही नहीं मिलती, उसे जाना ही पड़ेगा। जिनको बिना देखे हम जी नहीं सकते, जीना भी नहीं चाहते, उनको देखने का मन नहीं करेगा। वहाँ काल दिखायी पड़ेगा। तुलसी को काल ही दिखाई पड़ा, निकल खड़े हुए और अपना गन्तव्य पा लिया। इस प्रकार पुरुष पारस होता है। बच्चे स्वयं अपना भाग्य लेकर आते हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।

इस सम्बन्ध में पूज्य गुरु महाराज एक कथानक सुनाया करते थे। एक राजकन्या थी बड़ी होनहार! बड़ी सुलक्षणा! गुलफाम की तरह! वह जब शादी लायक बड़ी हो गयी तो राजा ने अपने कुल-पुरोहित को, जो जंगल में पाठशाला चलाते थे, बुलवाया। राजा ने उनसे निवेदन किया– ‘‘पंडित जी! इसके ग्रह-नक्षत्र-लग्न इत्यादि का विचार कर लें।’’ पंडित जी ने गणित लगाया कि यह रानी नहीं, महारानी होगी। लक्ष्मी कभी इसका साथ नहीं छोड़ेंगी। जिसके साथ इसका विवाह होगा वह युद्ध में कभी पराजित नहीं होगा। यह समृद्धि और यश की स्वामिनी होगी। इससे दोनों कुल यश के भागी होंगे। अब तो नारदवाली दशा पंडित जी की हो गयी। उन्होंने विचार किया कि इससे विवाह कर क्यों न हमीं महाराजा हो जायँ।

मनन-चिन्तन के पश्चात् पंडित जी बोले– ‘‘राजन्! कन्या तो सुलक्षणा है किन्तु इसमें जरा-सी खोट है। यदि इसका विवाह कर सही सलामत यहाँ से विदा करते हैं, तो यह जहाँ जायेगी उस वंश का नाश करेगी और यहाँ भी आपका सर्वनाश हो जायेगा।’’ राजा ने पूछा, ‘‘पंडित जी! इस दोष के निवारण का क्या कोई उपाय है?’’ पंडित जी ने कहा, ‘‘राजन्! उपाय तो है किन्तु कठिन है। हीरे-जवाहरातवाले जेवरों से सुसज्जित कर इसे लकड़ी के हवादार सन्दूक में बन्दकर गंगा की धारा में प्रवाहित कर दें। अयाचित इसे कोई पा जायेगा, तो जहाँ जायेगी महारानी होगी। इसके पश्चात् इसके जीवन में कभी कोई अभाव नहीं रहेगा, आपका भी यश फैलेगा।’’

इकलौती पुत्री के हित के लिए राजा ने छाती पर पत्थर रखकर, दोनों वंशों की सुरक्षा के लिए सन्दूक तैयार कराया और हीरे-जवाहरात सहित कन्या को सन्दूक में बन्द कर नदी में प्रवाहित कर दिया। राजपरिवार आँसुओं से भींगा था। पण्डित जी ने विदाई का मंत्र पढ़ा और शीघ्रता से पाठशाला पहुँचे। उन्होंने शिष्यों से कहा– ‘‘देखो, आज तुमलोगों की छुट्टी है।’’ बच्चे बहुत प्रसन्न हुए। पंडितजी ने कहा– ‘‘लेकिन तुमलोगों को एक काम करना है। एक सन्दूक नदी में बहता हुआ आ रहा है, उसे नदी से निकालकर मेरे कमरे में रख दो। मैं भी उसी कमरें में रहूँगा। कुछ अनुष्ठान है। बाहर से कमरा बन्द कर देना। कितना भी शोरगुल हो, दरवाजा मत खोलना। मैं कहूँ तब भी दरवाजा मत खोलना।’’ लड़के बहुत खुश हुए। वे चड्ढी-कच्छी पहनकर नदी के किनारे सन्दूक की प्रतीक्षा करने लगे।

होनी कुछ और ही थी। एक राजकुमार जंगल में शिकार खेलने निकला था। वह झाड़ियों के बीच से नदी के प्रवाह तक आया और अपने घोड़े को पानी पिलाने लगा। सौ-पचास घुड़सवार उसके साथ थे। उसकी दृष्टि उस मनोरम मंजूषा पर पड़ी। उसने सेवकों से कहा। वे गंगा की धारा में कूद पड़े और सन्दूक को किनारे ले आये। पिटारी खोलने पर उसमें से एक विश्वसुन्दरी कन्या निकली। राजकुँवर ने पूछा– ‘‘देवी! आप कौन हैं? अपना परिचय दें।’’ राजकन्या ने कहा, ‘‘परिचय क्या? अब तो आप ही मेरे सर्वस्व हैं।’’ सिपाहियों ने ताली बजायी। कुँवर ने अंगूठी पहनाकर कन्या से गन्धर्व विवाह कर लिया। शिकार में सिपाहियों ने एक जीवित भालू (रीछ) पकड़ रखा था। विनोदवश लोगों ने उस रीछ को उसी मंजूषा में बन्द कर पुन: गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया।

पाठशाला के समीप नदी में तैरते हुए सन्दूक को देखकर बच्चे कूद पड़े, सन्दूक उठाकर कमरे में रख दिया। धड़कते दिल से पंडितजी भी ‘स्वस्ति न: इन्द्रो वृद्धश्रवा:’ कहते हुए कमरे में घुसे। कमरा बन्द हो गया। पंडित जी ‘द्यौ: शान्ति: अन्तरिक्ष शान्ति: पृथ्वी शान्तिरापोशान्ति:’, ‘सर्वेग्रहा: शान्तिकरा भवन्तु’ शान्ति-पाठ करते हुए जहाँ सन्दूक खोला, भूखा-प्यासा रीछ पंडित जी के ऊपर टूट पड़ा। पंडितजी चिल्लाये– बचाओ-बचाओ। लड़के दौड़े तो मॉनीटर ने कहा– ‘‘नहीं, गुरुजी ने कहा था– ‘मैं कहूँ तब भी मत खोलना।’ अनुष्ठान तो अनुष्ठान! गुरुओं के अनुष्ठान भी तो विलक्षण होते हैं।’’

थोड़ी ही देर में पंडितजी को आभास हो गया कि अब मौत निश्चित है। एक खड़िया उनके हाथ लगी। बच्चों के शिक्षार्थ उन्होंने दीवाल पर लिख दिया–

मम इच्छा दैव नास्ति, दैव इच्छा परबलम्।

राजद्वारे राजकन्या, विप्र भालू भच्छतम्।।

मेरी इच्छा दैव (प्रारब्ध) ने नष्ट कर दिया, दैव की इच्छा ही प्रबल है। राज्यकन्या तो राजदरबार में पहुँच गयी किन्तु विप्र को भालू खा गया। अस्तु, पुरुष पारस होता है। उस कन्या का भाग्य समय पर काम कर गया।

परमहंस आश्रम–मधवापुर की एक घटना है। पूज्य गुरु महाराज ने साधनावस्था में वहाँ निवास किया था। महाराज जी के अनुसुइया निवासोपरान्त भी अनुसुइया आश्रम के दो-एक महात्मा वहाँ निवास करने लगे थे। उन दिनों वहाँ स्वामी भगवानानन्द जी विराजमान थे। मधवापुर में एक चाईं परिवार रहता था। लोगों को ठगना उनका धंधा था। उनके पास अकूत सम्पत्ति थी। उस चाईं के आठ लड़के थे। आठो लड़के अलग-अलग बग्गी में स्कूल जाते थे। उन दिनों या तो मनकापुर स्टेट का राजकुमार बग्गी में आता था या उस चाईं के लड़के। आठो लड़के बड़े हुए तो उसके वृद्ध पिता ने सम्पत्ति का बँटवारा कर दिया। सूप में अशरफी (सोने के सिक्के) भरकर आठ जगह ढेरी लगायी गयी। इसी प्रकार स्वर्णाभूषण रखे गये। चाँदी की तो गणना ही न थी।

उस वृद्ध के मरने के दस-पन्द्रह साल के भीतर ही पता नहीं क्या हो गया? सारा धन समाप्त हो गया। न चोरी हुई न डाका पड़ा। एक को छोड़कर सभी लड़के भी काल कवलित हो गये। एक लड़का जीवित था तो वह भी पागल! वह कभी-कभी रात को दस बजे के आसपास आश्रम से थोड़ा दूर बाँस की एक कोठी में आकर बैठ जाता था। स्वामी जी कहते थे– ‘‘क्यों रे बलई!’’ आश्रमीय भक्तों से स्वामी जी कहते– ‘‘भूखा-प्यासा आया होगा। उसके अड्डे पर जाकर देखो।’’ उन दिनों हम भी मधवापुर आश्रम में थे। लोगों ने पास जाकर बुलाया तो न दण्ड न प्रणाम! उसने कहा– ‘‘भतवा देत्यो!’’ लोग थाली भरकर उसे भोजन कराते जबकि वह पहले अरबपति रह चुका था।

बहुत से लोगों को माता-पिता ने बहुत दिया परन्तु लड़के पाये कुछ नहीं। उस राजकन्या को निकाल दिया था, वह सबकुछ पा गयी। सीताजी को विश्व में सर्वोपरि सुलक्षणसम्पन्न, भगवान कोटि के युवराज को जनक ने सौंपा, अपने भाग्य की सराहना की लेकिन सीता दस दिन से अधिक गद्दी पर कभी भी नहीं बैठ पायी। चक्रवर्ती सम्राट की पटरानी जंगलों में नंगे पाँव घूमी। इसीलिए,

मत दीजो मावड़लीन दोस करमाँरी रेखा न्यारीन्यारी।।

माता मीरा का यह एक भजन है। वह स्वयं भी बड़ी-बड़ी परीक्षाओं से गुजरी थीं। अन्त में उन्होंने अपने भक्तों को उपदेश दिया कि अपने माता-पिता को कोई दोष न दे। कर्मों के अनुसार सबके भाग्य की रेखा अलग-अलग है। पूरा भजन इस प्रकार है–

मत दीजो मावड़लीन दोस, करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।

एक मायड़ रे बेटा चार, चारोंरी करणीं न्यारी न्यारी।

पहलो राजा जी रे दरबार, दूजोड़ो हीराँ पारखी।

भाई रे! तीजो बाजारों री हाट, चौथोड़ो फेरे पूनियाँ।

भाई रे! मत दीजो मावड़लीन दोस करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।।

एक गाय रे बछड़ा चार, चारोंरी करणी न्यारी न्यारी।

पहलो सूरज जी रो साँड़, दूजोड़ो शिवरो नादियो।

भाई रे! तीजो घाणीवालो बैल, चौथो वणजारो लादियो।

भाई रे! मत दीजो मावड़लीन दोस करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।।

एक बेल रे तुम्बा चार, चारोंरी करणी न्यारीन्यारी।

पहलो सतगुर जी रे हाथ, दूजो जल जमना भरयो।

भाई रे! तीजो तम्बूरा री बीन, चौथोड़ो भिक्षा मागियो।

भाई रे! मत दीजो मावड़लीन दोस करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।।

एक माटीरा बर्तन चार, चारोंरी करणी न्यारीन्यारी।

पहले में दहीड़ो बिलोय, दूजोड़ो शिवरी झारियाँ।

भाई रे! तीजो पनिहारियो सीस, चौथोड़ो मृदम वाड़ियो।

भाई रे! मत दीजो मावड़लीन दोस करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।।

मीरा कहती हैं कि अपने सीमित उपलब्धियों के लिए माँ को दोष कदापि न दें। सबके कर्म अलग-अलग, इसलिए सबके भाग्य की रेखा भी अलग-अलग है। एक ही माँ के चार लड़के, लेकिन चारों की भाग्यरेखा अलग-अलग है। पहलो राजा जी रे दरबार– उन चार में से एक लड़का राजा के दरबार में सेनापति, मंत्रीपद का उपभोग कर रहा है। दूजोड़ो हीराँ पारखी– दूसरे लड़के का उससे हल्का भाग्य; हीरे को परखनेवाला जौहरी बन गया। तीसरे लड़के का इससे हल्का भाग्य तीजो बाजारों री हाट– कहीं कपड़ा लगा दिया, कहीं टैबलेट गिनने लगा, कहीं आइसक्रीम बेचने लगा– दिनभर अपनी रोजी-रोटी में व्यस्त और चौथोड़ो फेरे पूनियाँ– मशीनों के आविष्कार से पूर्व चरखे से सूत कातते थे। रुई के छोटे-छोटे फाहे बनाये जाते थे जिसे पूनी कहते थे। सूत कातने में एक पूनी समाप्त होते ही चट दूसरी पूनी चरखे के तार में लगा देते थे। इस प्रकार उसी माँ का चौथा लड़का दिन भर पूनियाँ ही बना रहा है। आज की दुनिया में जैसे कोई कालीन का टपका ही काट रहा है। माँ-बाप एक और परिणाम चार! इसलिए मत दीजो मावड़लीन दोस– माँ को दोष न दें। सबके अपने-अपने कर्म (भाग्य) हैं।

मीरा ने दूसरा उदाहरण पशु-जगत् से लिया। एक गाय के चार बछड़े। उद्गम एक, लेकिन चारों की भाग्य-रेखा अलग-अलग देखी गयी। पहलो सूरज जी रो साँड़– गुजरात, राजस्थान इत्यादि क्षेत्रों में साँड़ दागते हैं तो भगवान सूर्य को अर्पित करते हैं। सूर्य के रथ के पहिये जैसा उसके पुट्ठे पर दागते हैं। अब वह सूर्य जी का हो गया। उसे कोई छड़ी नहीं मार सकता। वह आयुपर्यन्त निर्द्वन्द्व घूमा करता है। यह पहली श्रेणी के बैल का भाग्य है। उसी गाय का दूसरा बछड़ा शिवरो नादियो– शिवजी का नन्दी बना दिया गया। उसे दिखाकर भिक्षा माँगते हैं। काशी में शंकरजी के नाम पर बछड़े छोड़े जाते हैं। वह भी काशी की गलियों में पत्तल चाट रहे हैं, कहीं डंडा भी खा रहे हैं। काम कुछ नहीं, आराम से जीवनयापन हो जाता है। भाई रे! तीजो घाणीवालो बैल– उसी गाय के एक बछड़े की तकदीर तीसरी श्रेणी की हो गयी, वह कोल्हू का बैल हो गया। कबीर कोल्हू के बैल का उदाहरण देते हैं–

आसन मारे क्या भया, मुई न मन की आस।

ज्यों कोल्हू के बैल को, घर ही कोस पचास।।

कबीर कहते हैं– यदि मन से आशा-तृष्णा समाप्त नहीं हुई है तो भजन के लिए आसन लगाने से ही क्या लाभ होगा? क्योंकि जिस मन को बैठना चाहिए वह तो चक्कर मार रहा है। जैसे कोल्हू का बैल चलता तो एक सीमित स्थान में है किन्तु वह उसी घर में सैकड़ों किलोमीटर का चक्कर लगा लेता है। निरन्तर चलना बैल के भाग्य की तीसरी श्रेणी है और उससे भी गया-बीता चौथी श्रेणी का भाग्य उस बैल का है जिसे बणजारो लादियो– जो बनजारों के हाथ लग गया। बनजारा उस व्यापारी को कहते थे जो दूर-दराज के नगरों तक जीवनोपयोगी वस्तुओं को बैलों पर लादकर क्रय-विक्रय किया करता था। नमक इत्यादि लादकर अटक से कटक तक, काबुल से कन्याकुमारी तक एक बार आने-जाने में ही बैल की आयु के दिन पूरे हो जाते थे। आजीवन एक भरपूर बोझ उसकी पीठ पर रहा जबकि माँ एक, परिवार एक किन्तु चारों के भाग्य अलग-अलग! अगली पंक्ति में मीरा वनस्पति जगत् का उदाहरण लेती हैं कि वहाँ भी सबके भाग्य अलग-अलग हैं–

एक बेल रे तुम्बा चारि, चारोंरी करनी न्यारी न्यारी।

लौकी की एक बेल में चार तुम्बे लगते हैं लेकिन चारों की भाग्य-रेखा अलग-अलग दिशा में जा रही है। उनमें से पहलो सतगुरु जी रे हाथ– सर्वोपरि भाग्य उस तुम्बे का निकला जो सद्गुरु जी के हाथ में कमण्डल के रूप में सेवा कर रहा है। दूजो जल जमना भरयो– दूसरी श्रेणी का भाग्य उस तुम्बे का है जिसमें गंगा-यमुना का पवित्र जल भरकर किसी ने बड़े यत्न से घर के एक कोने में रख दिया है। पर्वों पर, मांगलिक अवसरों पर या किसी के अन्तिम समय में ही उस तुम्बे से थोड़ा-सा जल लेकर उसमें अन्य जल मिलाकर आचमन कर लेते हैं। पवित्र जल का संसर्ग तुम्बे की दूसरी श्रेणी का भाग्य है। भाई रे! तीजो तम्बूरा री बीन– तीसरी श्रेणी का भाग्य उस तुम्बे का है जिसे वीणा बजाने के लिए तम्बूरे का रूप दे दिया गया है– ध्वनि-प्रसारण–यंत्र बना दिया गया– सिर पर हमेशा टिन्न-टिन्न! और उससे भी निचले स्तर का भाग्य उस तुम्बे का निकला– चौथोड़ो भिक्षा मागियो– उस चौथे तुम्बे का उपयोग भिक्षा माँगने में किया जा रहा है। उस तुम्बे का सिर आधा काटकर ‘माई! रामचन्दरजी सहाय करें! भिक्षुक को भी दो मुट्ठी मिले…’ कह रहे हैं। उद्गम-स्थली एक किन्तु चौथा तुम्बा भिक्षा माँग रहा है।

अन्त में मीरा ने जड़ कहे जानेवाले पदार्थों को इंगित किया कि भले ही मानवेतर योनियाँ कर्मानुसार भोग भोगने के लिए हैं, नया कर्म-संस्कार वे सृजित नहीं कर पातीं, फिर भी भोग की निम्न-उच्च श्रेणियाँ वहाँ भी कर्मानुसार मिलती हैं। उदाहरण के लिए–

एक माटीरा बर्तन चार, चारोंरी करणी न्यारी न्यारी।

कुम्हार एक ही स्थान से मिट्टी लेता है, उसे सानता है, लोंदी तैयार करता है। वह एक ही चाक पर समान परिश्रम से चार पात्र तैयार करता है, पकाता है; लेकिन चारों का भाग्य अलग-अलग है। उनमें सर्वोपरि भाग्य पहलो में दहीड़ो विलोय– दही मथनेवाले पात्र का है– रात-दिन दूध-दही, मलाई-मक्खन, मठा और घी से लबालब! सारा जीवन स्नेहसिक्त बीतता है। दूसरी श्रेणी का भाग्य उस मटके का है– दूजोड़ो शिव री झारिया– घड़े में नीचे छिद्र कर दिया, झारी बनाकर शंकरजी के ऊपर लटका दिया। अब उससे टप-टप-टप-टप बूँदें शिवजी का अभिषेक कर रही हैं। यह तो है कि उसे छेदा गया, छोटा-सा ऑपरेशन हुआ, फिर भी उसका भाग्य संतोषजनक है क्योंकि भगवान के समीप है और उससे भी हलका भाग्य– तीजो पणिहारियो सीस– तीसरी श्रेणी का भाग्य उस घड़े का है जो पनिहारियों के सिर पर है। आजकल तो हैण्डपम्प, सबमर्सिबल पम्प लग गये, पाइप लाइन बिछ गयी। एक जमाना था कि भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में माताएँ सिर के ऊपर घड़े पर घड़ा, घड़े पर घड़ा, सबके ऊपर छोटी-सी लुटिया रखकर पनघट पर जाती थीं और वहाँ से जल भरकर वापस आती थीं। दिन जल भरते बीतता था। और सबसे हतभाग्य वह घड़ा था– चौथोड़ो मृदम वाड़ियो– शौच के लिए जल ले जानेवाला पात्र, डोल-डाल जाने का लोटा! जैसे आजकल हैण्डपम्प के पास दो-चार बोतल-डिब्बे पड़े रहते हैं। चारों पात्रों में प्रयुक्त मिट्टी एक, निर्माता एक, उपकरण एक, एक आँच पर चारों एक साथ तैयार हुए किन्तु एक का भाग्य उसे कहाँ ले गया और चौथा किस उपयोग में लाया गया। इसलिए मत दीजो मावड़लीन दोस, करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी।– माता-पिता को दोष मत दो कि माँ ने उस बच्चे के प्रति पक्षपात किया या पिताजी ने हमारे साथ न्याय नहीं किया। आपका न्याय तो आपके पीछे-पीछे आपका भाग्य करता चला आ रहा है।

भाग्य की प्रबलता के अनेकानेक कथानकों से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है। हिमाचल नरेश के यहाँ बड़ी मनौती के पश्चात् एक कन्या का जन्म हुआ। उसका नाम पार्वती रखा गया। नरेश के यहाँ देवर्षि नारद का पदार्पण हुआ। ऋषि ने कन्या की भाग्य-रेखा का अवलोकन किया। वह बोले– ‘‘ओह! अत्यन्त सुलक्षणा! माता-पिता इससे यश पायेंगे। यह अम्बिका, उमा, भवानी नामों से जगत् में पूज्य होगी; किन्तु इसकी हस्तरेखा में एक छोटा-सा दोष है।’’ राजा ने पूछा– ‘‘वह क्या?’’ नारदजी ने बताया–

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल वेष।

अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।। (रामचरितमानस, १/६७)

इसके हाथ की रेखा ही ऐसी है कि इसका पति योगी होगा, अमंगल वेषधारी होगा, नग्न होगा, जटाधारी होगा। इतना ही नहीं–

अगुन अमान मातु पितु हीना।

उदासीन सब संसय छीना।। (रामचरितमानस, १/६६/८)

उसमें कोई गुण नहीं होगा, उसके माता-पिता का भी ठिकाना नहीं होगा। अब माता मैना तो भोंकार छोड़कर लगी रोने। राजा भी उदास! छटपटाकर रह गये। उन्होंने पूछा– ‘‘महाराज! इन दोषों के निराकरण का कोई उपाय भी है?’’ नारदजी ने कहा– ‘‘जो लक्षण हमने बताये, वह तो कहीं जाने वाले नहीं हैं। हाँ, एक रास्ता है। जो भी लक्षण हमने बताये, वह सब-के-सब भगवान शिव में भी पाये जाते हैं। यदि भोलेनाथ शिव इसका वरण कर लें तो दोष भी गुण कहलायेंगे; किन्तु उन्हें प्राप्त करना कठिन है। हाँ, एक उपाय है–

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी।

भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।। (रामचरितमानस, १/६९/५)

यदि तुम्हारी कन्या तपस्या करे। पार्वती को स्वप्न भी आया कि जा, कर तपस्या! वह तपस्या में लग गयी। तपस्या फलीभूत हुई। बारात भी चल पड़ी। भगवान विष्णु ने कहा– हमलोग शंकरजी के बारात के लायक ही नहीं हैं। इसलिए सबलोग शंकरजी के समाज से पीछे अपना-अपना समाज अलग-अलग कर चलें।

अब आगे-आगे शंकर जी नन्दी पर सवार पीछे भक्तों की ओर मुख करके बैठे हैं ताकि भक्तलोग दर्शन पाते रहें। प्रभु का दर्शन करने के पश्चात् उनके गणों का क्या कहना? उनकी खुशी का वारापार नहीं था। कोई शृंगी बजा रहा था, कोई गाल बजा रहा था तो कोई पेट ही थपथपा रहा था। औरतों ने ऐसी बारात को देखा तो घबड़ा गयीं। माता मैना के हाथ से आरती की थाल छूट गयी। वह बिटिया को लेकर एक कमरे में घुस गयीं और कहा– हम मर जायेंगे, हमारी बिटिया भले ही कुँवारी रह जाय, ऐसे वर से हम इसका विवाह नहीं करेंगे। क्यों? माता मैना कारण बताती हैं–

गौरा के शिव से सँघतिया, कैसे सफरी?

शिव के साथ मेरी गौरी का निर्वाह कैसे होगा? समस्या क्या है? तो–

बर बौड़म बौराह मेरी गिरिजा सरल सुकुमारी।

मधुर मधुर मिष्ठान्न खियवली हम सोने की थाली।

ऊ चबाले बेल पतिया, कैसे सफरी?

वर पागल ही नहीं, पागलों का सरदार है, सैकड़ों पागल इनके पीछे लगे हैं। हम अपनी गौरी को मिष्ठान्न खिलाते हैं जबकि यह बेल की पत्ती चबाते हैं, धतूर खाते हैं। भला इनके संग गौरा का निर्वाह कैसे होगा?

अपने तो अलमस्त बनल, जग में कहवैहैं भोला।

गिरिजा से पिसवइहैं सखियों भाँग धतूरा गोला।

दिनवा रतिया ई अफतिया कैसे सफरी?

प्राय: स्त्रियाँ सुबह-शाम भोजन बनाकर बर्तन साफ कर गृहकार्यों से निश्चिन्त हो जाती हैं लेकिन भोलेनाथ के यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है। सुबह-शाम भोजन नहीं चाहिए। चौबीसों घण्टे भाँग चाहिए। दिन-रात घोंटे रहो, लाये रहो। रात-दिन की इस साँसत में निर्वाह कैसे होगा? कुछ धन-दौलत होता तो उससे भी सन्तोष किया जा सकता था; किन्तु इनके यहाँ तो वह भी नहीं–

धन के नाम पर टुटही मड़ई बुढ़वा बैल दिखाला।

आभूषण के नाम पर डमरू त्रिशूल केहरि छाला।

अइले गइले की इज्जतिया कैसे सफरी?

धन के नाम पर एक टूटी-सी झोपड़ी, सवारी के लिए एक बूढ़ा बैल जो एक हराई चलने लायक भी नहीं है। यह है राजकुमारी! राजवंश की एक मर्यादा होती है। दरवाजे से कोई भूखा निकल जाय, यह असम्भव है। आने-जाने वाले का स्वागत-सत्कार, दरवाजे की मान-मर्यादा यह कैसे निभाएगी? अंत में माता मैना निर्णय देती हैं–

जल में बूड़ब जलब आग में जग के अपजस लेबै।

मंगल मूरति सुता ऐसन बउरहवा के न देबै।

मनबै न काहू के बतिया कैसे सफरी?

हम आग में कूद जायेंगे या जल में डूबकर प्राण दे देंगे, संसार का सारा अपयश हमें स्वीकार है लेकिन इस पगलंठ को अपनी मंगलमूर्ति सुकुमारी कन्या नहीं देंगे, कभी नहीं देंगे। माँ का हृदय व्यथित था, पार्वती ने ही समझाया–

तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका।

मातु व्यर्थ जनि लेहु कलंका।। (मानस, १/९६/८)

माँ! क्या भाग्य के अंक आप मिटा सकती हो? व्यर्थ कलंक क्यों लेती हो? यदि हमारे भाग्य में यही है तो आप क्या करेंगे और हम भी क्या कर सकते हैं! करनी का भार तो किसी-न-किसी को सहन करना ही पड़ेगा। ब्याह हो गया।

उस युग-जमाने से आज तक करोड़ों राजा-महाराजा आये और गये, किसी के इतिहास का पता नहीं है, किंवदन्तियों में भी किसी की चर्चा तक नहीं है लेकिन आज भी जहाँ पार्वती का नाम आता है हिमवन्त और मैना की बरबस याद आ जाती है। यही है– एहि तें जसु पैइहिं पितु माता।

भाग्य की प्रबल पक्षधर मैना की बिटिया भी दो-एक बार भाग्य से लड़ने को उद्यत हो गयी। देवर्षि नारद की गणना खुराफाती ऋषियों में होती है। एक बार उनका पदार्पण कैलाश पर हुआ। भोलेनाथ उस समय भजन-समाधि में थे। नारद जी ने पार्वती से कहा– ‘‘आपने देखा, आकाश में जो विमान जा रहा है उसमें इन्द्राणी शची देवी विराजमान हैं, सम्पूर्ण शरीर हीरे-जवाहरात से जड़ित स्वर्णाभूषणों से लप-झप कर रहा है। उधर देखें, लक्ष्मी जी भी जा रही हैं। जिधर से गुजरती हैं, सोना ही सोना झड़ता चला जा रहा है। देवियों की उस सभा में आप बैठने योग्य नहीं हैं।’’

पार्वती की भृकुटि पर बल पड़ गये। वह बोलीं– ‘‘क्यों? मैं उन सबके बीच बैठने लायक क्यों नहीं हूँ? भगवान शिव सर्वोपरि देव महादेव हैं, मैं उनकी अर्द्धाङ्गिनी हूँ। वह अर्द्धनारीश्वर कहलाते हैं। मैं तो आधा शिव ही हूँ।’’ नारद ने कहा– ‘‘माताजी! बातें आप कितनी ही क्यों न बनायें, लेकिन कहाँ उनकी शान और कहाँ आपका यह भीखमंगा स्वरूप! आभूषणों के बिना स्त्री की गरिमा ही कहाँ होती है।– ऐसा ही मैंने सुना है, माते! नाराज न होइएगा।’’ प्रणाम करके नारद जी चलते बने।

नारद की बात पार्वती की समझ में आ गयी। अपनी दयनीय स्थिति पर उन्हें किञ्चित् रोष आ गया। उन्होंने मुँह फुला लिया। राजा-महाराजाओं के यहाँ तो कोपभवन होता है, पार्वती के मायके में रहा भी, यहाँ वह व्यवस्था कहाँ? वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गयीं, बात ही नहीं कर रही थीं। शंकर जी ने पूछा– ‘‘क्या हो गया?’’ पार्वती ने कहा– ‘‘हम आभूषण पहनेंगे।’’ शंकर जी ने कहा– ‘‘भजन छोड़कर अब आभूषण पहनने का मन हो गया; क्या बात है?’’ पार्वती ने कहा– ‘‘देखें, सभी देवताओं की स्त्रियों ने आभूषण पहन रखे हैं, हमें भी चाहिए।’’ शंकर जी ने बहुत समझाया किन्तु कोई तर्क पार्वती के गले के नीचे नहीं उतरा।

अंततोगत्वा शंकर जी ने अपनी मूँछ का एक बाल उखाड़ा और बोले– ‘‘इसे कुबेर को दे देना और इसके बदले में जेवर पहन लेना।’’ कुबेर ने देखा कि माताजी आ रही हैं। वह उठकर खड़ा हो गया, दौड़कर चरणों में जा गिरा और बोला– ‘‘माताजी! मुझसे कोई भूल हो गयी क्या? आपने यहाँ आने का कष्ट कैसे किया? हमें ही बुलवा लिया होता।’’

बड़े संकोच से पार्वती बोलीं– ‘‘भैया कुबेर! हम कुछ आवश्यक कार्य से आये हैं। काम ही कुछ ऐसा है। यह बाल ले लो और इसके बदले थोड़ा जेवर दे दो।’’ पार्वती सोच रही थीं कि इसके बदले बहुत होगा तो नाक की कील मिल जायेगी या कान का कोई छोटा आभूषण मिल जायेगा। इस बाल के बदले और मिल ही क्या सकता है? बड़े संकोच से उन्होंने वह बाल कुबेर की तराजू पर रख दिया। कुबेर लगा अपना खजाना चढ़ाने! पूरा खजाना आ गया, बाल फिर भी भारी! कुबेर स्वयं भी कूदकर तुला पर बैठ गया, तब भी बाल भारी पड़ा। कुबेर ने कहा– ‘‘माता जी! हमारा सारा राज्य ले लें। अलकापुरी का सारा ऐश्वर्य हमने रख दिया किन्तु इस बाल का मूल्य हम नहीं दे सकेंगे। आप जितना चाहें उतना जेवर योंही पहन लें, भोलेनाथ के क्रोध से हमें बचायें।’’

पार्वती बोलीं– ‘‘अच्छा, हमारा बाल लाओ।’’ उसे लेकर वह वापस कैलाश चली आयीं। भोलेनाथ ने पूछा– ‘‘आभूषण पहन आयी?’’ पार्वती ने कहा– ‘‘हाँ, पहन आयी। अब वास्तविक जेवर हमें मिल गया, मेरा भ्रम दूर हो गया।’’ इसके पश्चात् पार्वती ने कभी जेवर पहनने की इच्छा ही नहीं की।

वस्तुत: आभूषण है क्या? जैसे लोहा वैसे ही पत्थर, रत्न और सोना पृथ्वी से निकले खनिज मात्र हैं। कुछ लोगों को हीरे की चमक अच्छी लग रही है तो कुछ को सुवर्ण! दुर्लभता से इनका मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। इनका जीविकासम्बन्धी उपयोग अवश्य है। नीतिवचन में है–

श्रोत: श्रुतेनैव न तु कुण्डलेन,

     दानेन पाणि: न तु कंकणेन।

विभाति काय: करुणापराणाम्,

     परोपकारैर्नतु चन्दनेन।।

अर्थात् कान की शोभा श्रुतियों का श्रवण करने में है, कुण्डल पहनने में नहीं। हाथ की शोभा दान से है, कंकण से नहीं। इसी प्रकार दयालु पुरुषों के शरीर की शोभा परोपकार से है, चन्दन के लेप से नहीं।

सारांशत: मनुष्य का शृंगार चरित्र से है और सर्वोपरि चरित्र है–

सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा।

जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।

राम बिमुख लहि बिधि सम देही।

कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।। (रामचरितमानस, ७/९५/२-३)

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)

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