चोलिया काहे न धुलाई
चोलिया काहे न धुलाई सुन्दर बाँके जोगिया।
जनम जनम की मैली चोली, विषय दाग परि आई।
बिन धोये पिया रीझत नाहीं, जनम अकारथ जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
राम नाम का साबुन ले लो, सतसंगति दरिआई।
अपने गुरु को कर ले बरेठा, जनम दाग धुल जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
‘रा’ से मैल कटे रग–रग की, ‘म’ से होत सफाई।
धोये जा हर साँस में पल–पल, धुलत–धुलत धुल जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
गंगा जमुना खूब नहाये, गया न मन का मैल।
आठ पहर जूझत ही बीता, जस कोल्हू का बैल।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
गुरु को जब लगि गुरु नहिं जाना, गुरु आज्ञा नहिं आई।
जान लिया जब गुरु स्वरूप को, सहज मुक्ति होइ जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
जिसकी चोली निर्मल हो गयी, अमर लोक लिये जाई।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सदगुरु सरन सहाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
(यह भजन हमें गुरु महाराज के सान्निध्य में सती अनुसुइया आश्रम, चित्रकूट, मध्यप्रदेश में एक प्रसिद्ध भजन गायिका से सुनने को मिला था। उन दिनों एक बारात आश्रम के समीप ददरी गाँव के मुखियाजी के यहाँ आयी हुई थी। बारातियों के साथ ग्रामवासी भक्तों की भीड़ महाराजजी के दशनार्थ आश्रम पर आ गयी थी। लोग उत्साह से बता रहे थे– महाराजजी! यह बारात मुखियाजी के यहाँ आयी है। महाराजजी ने कहा– हाँ, हो! अच्छी बारात है। लोगों ने कहा– इसमें बहुत प्रसिद्ध गायिका बाँदा शहर से आयी हैं। महाराजजी ने कहा– अच्छा है। आपलोग सुनें। तब तक उस गायिका ने भी महाराजजी को प्रणाम किया। महाराजजी ने कहा– बैठो भवानी! उधर बैठ जाओ। उसने बैठकर पुन: प्रणाम कर महाराजजी की सेवा में एक भजन सुनाने की प्रार्थना की। अनुमति मिलने पर उसने बड़े भाव से उपर्युक्त भजन प्रस्तुत किया जिसका आशय इस प्रकार है।)
चित्तवृत्ति ही चदरिया है। जन्म-जन्मान्तरों के भले–बुरे दाग इस पर पड़े हैं। जब जिस संस्कार का क्रम आता है, उसी के अनुरूप यह पिण्डरूप प्रदान करता रहता है, वैसा ही जन्म मिल जाता है। संत कबीर ने चित्तवृत्ति को चादर की संज्ञा दी है–
चदरिया झीनी झीनी बीनी।
राम नाम रस भीनी, चदरिया झीनी रे बीनी।।
चित्तवृत्ति इतनी विशाल है कि जड़-चेतन, सारे जीव-जन्तु, वनस्पतियाँ सभी के चित्र इसमें चित्रित हैं। लेकिन सद्गुरु की शरण में आने पर कबीर ने कहा– ‘चदरिया झीनी झीनी बीनी।’– चित्तवृत्ति को समेटकर इतना सूक्ष्म कर दिया कि अत्यन्त सूक्ष्म ब्रह्म तत्त्व में इसे बुन दिया। कैसे बुना? तो ‘राम नाम रस भीनी’– सदा राम के रस में भिंगो दिया। इसी प्रकार के भजन हैं– ‘लागा चुनरी में दाग…’ या ‘बलम राउर देसवा में चुनर बिकाय।‘ भगवान के दरबार में केवल विशुद्ध चित्त का ही समर्पण होता है; क्योंकि ‘निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।’ (मानस, ५/४३/५)– निर्मल मनवाला जन ही मुझे प्राप्त कर पाता है। भगवान को कपट, छल-छद्म अच्छा नहीं लगता।
इस भजन में संत कबीर ने चित्तवृत्ति को चोली की संज्ञा दी है। साधकों को वे कहते हैं– हे विलक्षण योगी! संयम में प्रवृत्त, योग-साधना में प्रवृत्त योगी! अपने चित्तवृत्ति की धुलाई क्यों नहीं की? प्रश्न उठता है कि इसमें दाग किसका है?
जनम जनम की मैली चोली विषय दाग परि आई।
बिन धोये पिया रीझत नाहीं, जनम अकारथ जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
इस चोली में जन्म-जन्मान्तरों के दाग पड़े हैं, जैसा कि कागभुसुण्डिजी ने कहा– ‘कवन जोनि जनमेउ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।’ ध्रुव ने जब भगवान का दर्शन पाया, तो कहा– ‘‘प्रभो! हमने तो सुना था कि करोड़ों-करोड़ों जन्मों तक यत्न करने के पश्चात् कभी आप कृपा कर दर्शन देते हैं, किन्तु मेरे ऊपर तो आपने बड़ी कृपा की कि जो छ: महीने में ही मिल गये।’’ भगवान ने कहा– ‘‘ध्रुव! इस पहाड़ की ओर तो देख।’’ ध्रुव ने कहा– ‘‘भगवन्! यह तो मानव-कंकालों का पहाड़ है।’’ भगवान ने कहा– ‘‘ये सारी हड्डियाँ तुम्हारी हैं। जन्म-जन्मान्तरों में यहाँ तुमने तपस्या की है। यह तुम्हारा प्राप्तिवाला आखिरी जन्म है। भजन में केवल छ: महीने शेष थे, आज वे पूरे हो गये और मैं मिल गया।’’ यही है ‘जनम जनम की मैली चोली।’ और दाग क्या था? विषय-वासनाओं के दाग। इनकी धुलाई किये बिना ‘पिया रीझत नाहीं’– ‘पिया’, जिन्हें प्राप्त कर लेने पर इस जीव की प्यास सदा-सदा के लिए मिट जाती है, वह प्रेमास्पद प्रभु इसकी धुलाई के बिना कभी नहीं रीझते। जिसके लिए यह दुर्लभ मानव-तन मिला है, यह अवसर व्यर्थ चला जायेगा – ‘जनम अकारथ जाई’।
मानस में प्रसंग है कि राज्याभिषेक के पश्चात् भगवान राम ने पुरवासियों की एक सभा बुलाई और सबको समझाया–
सुनहु सकल पुरजन मम बानी।
कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
जौं अनीति कछु भाषौं भाई।
तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
उन्होंने कहा क्या?
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सदग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है। यह मानव-तन देवताओं को भी दुर्लभ है – ऐसा सद्ग्रन्थों ने गायन किया है। क्या विशेषता है इस तन में? काम, क्रोध, मद, लोभ, भूख, प्यास, नींद, भय तो जीवमात्र में है, इस मानव-शरीर में कौन-सी विशेषता है? भगवान ने बताया कि यह साधन-धाम है। वह साधन जो आपको मोक्ष प्रदान कर दे, यह मोक्ष का दरवाजा है। ऐसे दुर्लभ मानव-तन को पाकर जिसने अपना निजी परलोक नहीं सुधारा,
सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।। (मानस, ७/४३)
इसलिए किसी पर एहसान न करें, अपना ही परलोक जो नहीं सुधार लेता वह काल को, कर्म को और ईश्वर को व्यर्थ ही दोष देता है। मनुष्य प्राय: दो-तीन बहाने बनाता है कि– (१) समय अनुकूल नहीं है, (२) हमारे कर्म में लिखा नहीं है, (३) ईश्वर हमसे कराते ही नहीं। भगवान राम कहते हैं– ऐसा कुछ नहीं है। यदि मनुष्य शरीर मिला है और उसने अपने परलोक को सुधारने का प्रयत्न नहीं किया तो सब दोष उसी का है।
इस चित्तरूपी चोली की धुलाई कैसे करें? संत कबीर बहुत सरल उपाय बताते हैं–
राम नाम का साबुन ले लो, सत संगति दरिआई।
अपने गुरु को कर ले बरेठा, जनम दाग धुल जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई……
जिस प्रकार वस्त्र धुलने के लिए साबुन का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार चित्त को धोने के लिए राम-नाम का जप आवश्यक है। ‘सत संगति दरिआई’– धुलाई के लिए दरिया अर्थात् जलस्रोत की आवश्यकता होती है। यह स्रोत सत्संग में मिलेगा। बरेठा (धोबी) वस्त्रों के दाग छुड़ा देता है, इसी प्रकार गुरु की युक्ति से जन्म-जन्मान्तरों के दाग धुल जाते हैं। एक सत्संग तो सत्पुरुषों की सभा को कहते हैं, किन्तु मानस के अनुसार, कबीर के अनुसार–
पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सत्संगति संसृति कर अंता।।
पुण्य का पुंज वर्तमान में साथ नहीं देता तब तक संत नहीं मिलते। संत मिले बिना सत्संग नहीं मिलता। पहले संत-संग, तब सत्संग। ऐसा नहीं कि कथावाचक बुला लिया और सत्संग हो गया। वास्तविक सत्संग तो संतों के द्वारा मिलता है। वे बतायेंगे कि सत्य क्या है और उससे संगत कैसे करें?
‘सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार।’– परम सत्य एकमात्र आत्मा है। चित्त को सब ओर से समेटकर उसकी संगत में लगा दें, यह सत्संग का वास्तविक आशय है। यह ध्यान, चिंतन, श्रद्धा के साथ सुरत को लगाने से सम्पन्न होता है, क्रियात्मक है। चित्त को सब ओर से समेटकर सत्य की संगत में लगा लें।
रामचरितमानस में सीता की शोध में तत्पर हनुमान की भेंट लंकिनी से हुई। ‘मुठिका एक महाकपि हनी। रुधिर बमत धरनी ढनमनी।।’ वह रक्त का वमन करती हुई पृथ्वी पर बहुत दूर तक लुढ़कती चली गयी। हनुमान की मुष्टिका से कई बलशाली निशाचर मूर्च्छित हो गये थे, लेकिन वह तुरन्त सँभलकर खड़ी हो गयी। ‘पुनि सँभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका।।’ उसने हाथ जोड़कर सशंकित होकर सविनय कहा–
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
जब रावण को ब्रह्माजी ने वरदान दिया था तो चलते समय मुझे एक पहचान दिया था कि–
बिकल होसि तैं कपि के मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे।।
उन्होंने कहा था कि कपि की मार से विकल होने पर समझ लेना कि अब निसिचरों का संहार होगा। आज मैं विकल हो गयी।
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।
आज मेरे बहुत सारे पुण्यों का उदय हुआ है जो राम-दूत को मैं प्रत्यक्ष देख रही हूँ।
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख, धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिली, जो सुख लव सतसंग।।
हे हनुमानजी! स्वर्ग और मोक्ष का सुख दोनों मिलाकर एक पलड़े पर रख दें और लव भर का सत्संग दूसरे पलड़े पर रख दें तो वह स्वर्गिक सुख उस सत्संग की बराबरी नहीं कर सकता। आज मुझे सत्संग प्राप्त हुआ है। मेरा अहोभाग्य है। वहाँ जो कुछ बोल रही थी, लंकिनी बोल रही थी, हनुमान तो कुछ बोले ही नहीं। यदि मुक्का मारना सत्संग है तब तो वह जरूर पा गयी होगी! क्या है सत्संग? वास्तव में शरीर ही एक सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड है, जिसमें मायिक प्रवृत्ति ही लंका है। जब इसमें वैराग्यवान पुरुष प्रवेश करता है तो लौ में जो स्फुरण उत्पन्न करती है वही वृत्ति लंकिनी है। कैसी भी लौ लगी हो, तरंग पैदा हो जायेगी। यही है लंकिनी। जब रूप-रस-गंध-शब्द-स्पर्शवाली पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ एक मुष्टिका का रूप ले लें, संगठित हो जायँ, संयमित हो जायँ, आँखें बाहर देखती नहीं, कान बाहर सुनते नहीं तो तरंग पैदा कहाँ से होगी! जहाँ ये एक संयम में समाहित हुईं, लव में स्फुरण आना बन्द हुआ, परमात्मा में एक पल के लिए भी लौ लग गयी तो भगवान के असीम आनन्द का स्रोत स्रवित हो जाता है। फिर उस आनन्द को स्वर्ग का सुख भी भुलावा नहीं दे सकता। वह चल पड़ता है उस सम्पूर्ण आनन्द की ओर, जो अभी एक पल के लिए उसे मिला है। दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उस व्यक्ति को भरमा सके।
धरती को आसन किया, तम्बू आसमाना।
चोला पहने खाक का, रहे पाक समाना।।
फिर तो ‘स्वर्ग नरक अपबरग समाना। जहँ तहँ देख धरे धनु बाना।।’– उसे सर्वत्र इष्ट का प्रसार ही दिखाई देने लगता है।
संक्षेप में, इस चित्तरूपी चोली की धुलाई के लिए राम-नाम का साबुन ले लें, दूसरी वस्तु है संतों का संग, उससे साधना का जो अभ्यास मिला है उसकी संगत करके लव भर के लिए सुरत स्थिर करें, आत्मा की संगति में अपने आपको लगा दें। लेकिन सद्गुरु के बिना यह संभव नहीं है इसलिए अपने गुरु को धोबी बना लें, फिर कैसा भी दाग हो, जन्म-जन्मान्तरों का दाग धुल जायेगा, जन्म-मृत्यु का बन्धन कट जायेगा।
आरम्भ में लोग राम-राम, ओम्-ओम् जैसे भी जप लेते हैं, किन्तु उन्नत अवस्था में जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर होता है। गुरु महाराज कहते थे– जो श्वास का भजन नहीं जानते, महापुरुष लोग अपनी कुटिया में उस साधु को दो रोटी भी नहीं देते थे, क्योंकि ऐसा साधु स्वयं गुमराह है तो दूसरों को भी उल्टा-सीधा बताकर गुमराह ही तो करेगा। ऐसे साधुओं को महाराजजी भी प्रश्रय नहीं देते थे। हम निवेदन करते थे कि महाराजजी! किसी साधु-अभ्यागत को दो रोटी के लिए आप क्यों भगाते हैं? गुरु महाराज कहते थे– तैं का जनिहे, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो जावा करत हैं। अस्तु, विशुद्ध नाम-जप का आधार श्वास है। बैखरी में नाम व्यक्त होता है, मध्यमा में कण्ठ से जपा जाता है किन्तु पश्यन्ती वाणी के जप का उतार-चढ़ाव श्वास-प्रश्वास पर है। श्वास आयी तो ‘रा’, गयी तो ‘म’। प्रतीक्षा करो कि श्वास कब आयी। आयी तो ‘रा’, लौटी तो ‘म’। एक भी श्वास हमारी जानकारी के बगैर व्यर्थ न जाने पाये। यही है,
रा से मैल कटे रग रग के, म से होत सफाई।
‘रा’ से एक-एक तन्तु का मैल कट जायेगा और ‘म’ कहने के बीच दूसरा संकल्प-विकल्प नहीं पैदा हुआ, तो ‘म से होत सफाई’– उतनी दूर की सफाई हो गयी, उतने देर के संस्कार समाप्त हो गये। हर श्वास से इस प्रकार धुलाई करने से धीरे-धीरे चित्तरूपी चोली के दाग धुल जाते हैं। साधक को धैर्य के साथ लगे भर रहना चाहिये।
धुलाई के अन्य उपाय भी संसार में प्रचलित हैं। कोई गंगा-स्नान करता है, कोई यमुना में, कोई बद्रीनाथ तो कोई केदारनाथ। ये हमारे पवित्र तीर्थ हैं।
गंगा जमुना खूब नहाये, गया न मन का मैल।
आठ पहर जूझत ही बीता, जस कोल्हू का बैल।।
पवित्र नदियों के तटवर्ती निवासी पूर्वजों के समय से ही इन पवित्र नदियों में स्नान करते ही तो आ रहे हैं, किन्तु मन का मैल नहीं गया। नियमित स्नान करते जीवन बीत गया। जिस प्रकार कोल्हू का बैल घर के भीतर एक ही स्थान पर चलते-चलते पचासों कोस की यात्रा कर लेता है लेकिन कहीं पहुँचता नहीं, उसी प्रकार इन तीर्थों का आजीवन सेवन करने पर भी मन के मैल नहीं जाते। माना कि ये हमारे पवित्र तीर्थ हैं लेकिन सम्पूर्ण धुलाई के लिए संस्कारों को काटकर स्थिति दिलानेवाला श्वास का ही भजन है। आरम्भ में तीर्थ अच्छी चीज है।
तीरथ गये एक फल, संत मिले फल चारि।
सदगुरु मिले अनन्त फल, कहे कबीर बिचार।।
तीर्थ जाने से एक फल है कि पुण्य बढ़ता है। संत मिलने से अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष चारों का रास्ता प्रशस्त हो जाता है, लेकिन कबीर कहते हैं कि सद्गुरु मिलने से जो अनन्त है, असीम है, वह परमात्मा ही सुलभ हो जाता है।
इस पथ में एक बात का विशेष महत्त्व है– गुरु की पहचान।
गुरु को जब तक गुरु नहीं जाना, गुरु आज्ञा नहिं आई।
जान लिया जब गुरु स्वरूप को, सहज मुक्ति होइ जाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…..
मानना अलग है लेकिन क्रियात्मक जानना कुछ और है। गुरु जब तक हृदय से जागृत नहीं हुए तब तक उनकी महिमा जानने में नहीं आती, तब तक हृदय में गुरु की आज्ञा प्रसारित नहीं होती। गुरु जितना वाणी से बताते हैं, उतना ही सच नहीं है। वाणी से वह तभी तक बताते हैं जब तक हृदय से नहीं बताते। जब वे आपके हृदय से बोलने लग जाते हैं, उसका नाम है गुरु-आज्ञा। फिर तो आप विदेश में हों तब भी गुरु के समीप हैं। समुद्र में हों तब भी गुरु पास में हैं। यदि इस तरह की आज्ञा का प्रसारण नहीं हो रहा है तो पास में रहते हुए भी गुरु का महत्त्व समझ में नहीं आता। जब गुरु के स्वरूप को आपने जान लिया तो ‘सहज मुक्ति होइ जाई’। स्वरूप पकड़ में आ गया तो मुक्ति सहज हो जाती है। परमात्मा यदि परम धाम है तो सद्गुरु ही प्रवेश-द्वार हैं, भक्ति की जागृति हैं, पूर्तिपर्यन्त पथ हैं।
जिसकी चोली निर्मल हो गयी, अमर लोक लिये जाई।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सदगुरु सरन सहाई।।
चोलिया काहे न धुलाई…….
जिस किसी की चित्तवृत्ति चोली धुल गयी, शुद्ध हो गयी, निश्चल हो गयी तो वह अमरलोक में प्रवेश पा जाता है। गुरु महाराज का कहना था कि जो हृदय में हो, वही साधक की जबान पर भी होना चाहिए। हृदय में कुछ और, जबान पर कुछ और–वह साधु कभी कामयाब नहीं होता; क्योंकि कपट आप बाद में करेंगे, भगवान पहले से जानते हैं कि तुम क्या करने जा रहे हो। इसलिए जिसकी चोली निर्मल हो गयी, वह मृत्यु से परे अमरलोक में प्रवेश पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! सृष्टि मरणधर्मा है। ‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता, ८/१६)– सृष्टि का रचयिता विधाता और यावन्मात्र जगत्, दिति की संतानें दानव, अदिति की संतानें देवता और मानव सब पुनरावर्ती स्वभाववाले हैं, जन्मने और मरनेवाले हैं, किन्तु मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। आत्मा अमृत तत्त्व है। इसे शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, आकाश इसे विलय नहीं कर सकता। यह सदा रहनेवाला एकरस, मृत्यु से परे, अमृत तत्त्व, शाश्वत, सत्य, सनातन पुरुष है। हम कौन हैं? सनातनधर्मी! सनातन कौन है? केवल आत्मा! हम हैं शाश्वत के पुजारी। शाश्वत है केवल परमात्मा। हम हैं सत्य के अन्वेषी और परम सत्य है केवल आत्मा। सृष्टि नश्वर है इसलिए भजन एक परमात्मा का करना चाहिए। अमर है आत्मा अर्थात् परमात्मा। अन्त:करण के अन्तराल में इसका निवास है इसलिए इसे आत्मा कहते हैं, सबमें रहते हुए सबसे परे है इसलिए परमात्मा, विभूतियों से युक्त है इसलिए विभु, सबका भरण-पोषण करता है इसलिए प्रभु, बृहद् है इसलिए ब्रह्म। ये तो विविध दृष्टियों से उसके सम्बोधन हैं। आप एक करोड़ नाम ले लें, भगवान का सम्पूर्ण नाम एक भी नहीं। इसलिए तो भगवान अमूर्त हैं, अरूप हैं, अनिर्वचनीय हैं। निर्मल चित्तवृत्ति अमरलोक में पहुँचा देती है अर्थात् आत्मा के आलोक में पहुँचा देती है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सदगुरु सरन सहाई।।
कबीर कहते हैं कि सद्गुरु की शरण, उनके प्रति समर्पण यही उस पथ पर एकमात्र सहायक हैं; और कोई नहीं। उनकी शरण-सान्निध्य से व्यक्ति अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है।
एक महात्मा भ्रमण करते हुए एक पुरानी हवेली पर पहुँच गये जिसका मालिक अपनी फिजूलखर्जी के कारण अब निर्धन हो चला था। शाम को मालिक घर आया तो महात्मा को देखकर बोला– महाराज! क्षमा कीजियेगा, हम आपके लिए दो रोटी का भी प्रबन्ध कर सकने में असमर्थ हैं। चलिये, आपको मुखियाजी के दरवाजे पर ले चलते हैं। वहाँ आपको भोजन, पानी और दो गिलास दूध भी मिलेगा। महात्मा ने कहा– ‘‘भाई! हमें न दूध पीना है, न भोजन करना है। इसी तख्त पर बैठकर रात्रि में भजन करेंगे।’’
महात्मा ने विचार किया– हवेली तो किसी भले आदमी की लगती है। इसके पास कुछ भी क्यों नहीं है? घर के मालिक ने बताया कि उसके पिता अच्छे ज्योतिषी थे, बहुत धन भी था किन्तु अपव्यय के कारण उसकी यह दशा हुई है। उसके पिताजी के रहते लोग उसे कर्ज भी दे देते थे, किन्तु अब कोई भी उसकी आर्थिक सहायता नहीं करता।
महात्मा ने पूछा– ‘‘क्यों रे! क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हारी कुण्डली बनायी है?’’ उसने कहा– ‘‘है तो!’’ महात्मा ने कहा– ‘‘ला, दिखा।’’ महात्मा भी ज्योतिषाचार्य थे, कुण्डली देखकर बोले– ‘‘क्यों रे! तुम्हारे पास कोई घोड़ा है क्या?’’ वह बोला– ‘‘हाँ महाराज! वह बबूल के नीचे बँधा है। इसी पर बैठकर श्राद्ध इत्यादि में जाया करता हूँ।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘तू इसे बेच दे।’’ वह बोला– ‘‘अरे महाराज! यही तो कुल धनधाम है, पूर्वजों की निशानी है, अब आप इसके भी पीछे पड़ गये।’’ बहुत कहने-सुनने पर उसने घोड़ा बेच दिया। उसी से संत-सेवा की।
दूसरे दिन प्रात: उसने कहा– ‘‘गुरु महाराज! एक घोड़ा वहाँ और बँधा है।’’ महात्मा बोले– ‘‘ठीक है, उसको भी बेच। चाहे जितने में बिके, बेच दे।’’ तीसरे दिन एक और घोड़ा बँधा मिला। महात्मा बोले– ‘‘उसको भी बेच।’’ इस तरह पचासों घोड़े बिक गये। एक रात ब्रह्मा ने स्वप्न में उन महात्मा से कहा– ‘‘क्यों हमारे पीछे पड़े हो?’’ महात्मा बोले– ‘‘भगवन्! हमसे कौन-सी भूल हो गयी?’’ ब्रह्मा ने कहा– ‘‘उस पंडित का घोड़ा क्यों बिकवाते हो?’’ महात्मा ने कहा– ‘‘उसमें आपका क्या नुकसान है प्रभो!’’ ब्रह्मा बोले– ‘‘उसके कर्म में केवल एक घोड़ा लिखा है।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘आपकी जय हो! हमने कब कहा कि उसे धन-धान्य दे दो। आप घोड़ा भेजते रहें।’’ ब्रह्मा ने सोचा कि ये महात्मा पीछा नहीं छोड़ेंगे। उस दिन से उस भक्त की व्यवस्था सुधर गयी, कुआदतें छूट गयीं और वह भी गुरु महाराज के निर्देशन में भजन करने लगा। अत: पहले संत-संग, फिर सत्संग!
प्राप्तिवाले हर महापुरुष की वाणी गीता का ही अनुवाद है। चित्त और मन पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं। प्राचीनकाल में चित और चिति– दो ही शब्द अन्त:करण के लिए प्रयुक्त होते रहे। कालान्तर में अन्त:करण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चार भागों में विभाजित कर समझा जाने लगा। इसी को अन्त:करण चतुष्टय भी कहते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।। (५/१९)
अर्जुन! उन पुरुषों के द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है जिनका मन समत्व में स्थित है। समत्व में स्थिति और संसार को जीतने में क्या सम्बन्ध है? भगवान कहते हैं– ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’– वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर इसका मन भी निर्दोष और सम की स्थितिवाला हो गया इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। भगवान कृष्ण मन के समत्व की जो बात कहते हैं, निर्दोष बनाने की बात करते हैं, संत कबीर का वही आशय ‘चोलिया की धुलाई’ से है। इस धुलाई के लिए सत्संग बहुत आवश्यक है।
एक राजा का तोता मर गया। उन्होंने कहा– मंत्रीप्रवर! हमारा पिंजरा सूना हो गया। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ। तोते सदैव तो मिलते नहीं। राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा– भगवन्! राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा– ठीक है, ले जाओ। राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया। ब्राह्ममुहूर्त में तोता बोलने लगा– ओम् तत्सत्…. ओम् तत्सत् … उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है। ‘चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देत रघुबीर।।’ कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक उसके मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि सुग्गा क्या मिला, एक संत मिल गये।
हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह सुग्गा मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया। किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये। पुन: राजा साहब ने कहा– मंत्रीप्रवर! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था हो जाती! मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था। मंत्री ने कहा कि इसे राजा साहब चाहते हैं। कसाई ने कहा कि आपके राज्य में ही तो हम रहते हैं। हम नहीं देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे। मंत्री ने कहा– नहीं, हम तो प्रार्थना करेंगे। कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो सुग्गे पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जायँ।
अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया। राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है। दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि उठ! हरामी के बच्चे! राजा बना बैठा है। मेरे लिये ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे! राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया।
दोनों सुग्गे सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया। आखिर भूल कहाँ हो गयी? अन्तर था तो संगति का! सत्संग की कमी थी।
संगत ही गुण होत है, संगत ही गुण जाय।
बाँस फाँस अरु मीसरी, एकै भाव बिकाय।।
सत्य क्या है और असत्य क्या है? उस सत्य की संगति कैसे करें? उसकी जागृति और पूर्तिपर्यन्त पथरक्षक सद्गुरु होते हैं–
पूरा सदगुरु ना मिला, मिली न साँची सीख।
भेष जती का बनाय के, घर–घर माँगे भीख।।
इसीलिए संत कबीर कहते हैं कि ‘चोलिया काहे न धुलाई?’
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)