तुम चलो दिवाने देस
भगवान का दर्शन, उनका स्पर्श और उनमें स्थिति प्रत्येक साधक की चाहत होती है; पर यह इतना आसान नहीं है। इसकी दुर्लभता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं–
गये हजारों लोग चितचोर चाह तेरी करते–करते।
पर न मिला दीदार कूच कर गये ध्यान धरते–धरते।।
कोई कहे हम पक्के हिन्दू शिखा सूत्र धारण करते,
कोई कहे हम मुसलमान बस दाढ़ी पर अकड़े फिरते।
आपस में दोऊ लड़कर मर गये राग–द्वेष करते करते,
पर न मिला दीदार…..।।
पंडित कवि कोविद रहे अनजान शास्त्र पढ़ते–पढ़ते,
वेद पुरान कुरान हुए हैरान ब्यान करते–करते।
पर न मिला दीदार…..।।
सतगुरु की जब दया हुई अनेक जनम साधन करते,
लखा दिया एक पल में जिसे चार वेद वर्णन करते।
गये हजारों लोग……,
पर न मिला दीदार…..।।
लगता है सद्गुरु की दया से एक पल में ही भगवान मिल जाते हैं; किन्तु दया की स्थिति तक पहुँचने में भी कई जन्म लग जाते हैं। अनेक जन्म साधन करने के पश्चात् दया हुई और तब ‘लखा दिया एक पल में जिसे चार वेद वर्णन करते।’
यह वेद, पुरान, कुरान इत्यादि पुस्तकों के अध्ययन से परमात्मा नहीं मिलते। यह तो भगवान के लिए श्रद्धा जागृत करने के उपकरण मात्र हैं जिनसे समर्पण की प्रेरणा मिलती है। समर्पित हो जाने के बाद शास्त्र अपना कार्य कर चुका। प्रभु-मिलन के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं। मिलने के लिए तो सद्गुरु की दया चाहिए; वह भी जन्म-जन्मान्तरों में साधन करते-करते दया की स्थिति में प्रवेश मिलता है।
भगवत्-पथ में म़जहब और सम्प्रदायों का कोई मूल्य नहीं है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन इत्यादि संगठन अच्छे महापुरुषों के पीछे सिमटा समाज है, जिनमें लोग परमात्मा की शोध को भूलकर परस्पर राग-द्वेष में उलझे पड़े हैं। साम्प्रदायिक संकीर्णता से प्रभु का स्वरूप तो नहीं दिखायी पड़ा? उसका तो एक ही तरीका है– सद्गुरु की शरण। उसके बाद जब साधना जागृत हो गयी तो प्रभु से मिलने का एक ही तरीका है– भजन की मस्ती! लगन ऐसी हो कि उसके पीछे उन्मत्त हो जायँ। गुरु महाराज की विद्या जिसे उपलब्ध है, उसे विरही (दीवाना) हो ही जाना चाहिए। इसी आशय का एक भजन सन्त कबीर का है–
अलख सँग मिलिहो, तुम चलो दिवाने देस।।
संत सदा उपदेश बतावें, घट अंदर दीदार करावें।
तन मन अर्पण करिहो, तुम चलो दिवाने देस।।
शब्द विहंगम बाजे तूरा, कोटि भाँति जहँ भभके नूरा।
बंक नाल सुधि करिहो, तुम चलो दिवाने देस।।
सुखमन सेज विहंगम सीढ़ी, माया गस्त करे चहुँ फेरी।
भरम भूलि मत रहियो, तुम चलो दिवाने देस।।
या पद का जो अरथ बिचारे, कह कबीर वे दास हमारे।
कोउ नाम का व्यवहारी मिलिहो, तुम चलो दिवाने देस।।
सभी भगवान को चाहते हैं, उनका दर्शन चाहते हैं, उनका आशीर्वाद चाहते हैं; लेकिन वे मिलते दिखाई नहीं देते। सन्त कबीर कहते हैं कि तुम अवश्य उनका दर्शन पाओगे, उनमें विलय भी पा जाओगे। केवल एक काम करो – ‘तुम चलो दिवाने देस।’ दीवाना का यहाँ आशय है विरही! भगवान के विरह में विकल! जैसा कि मीरा ने कहा था– ‘हे री, मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय।’ वह पागल नहीं थी, भगवान के प्रेम में विकल थी।
रामचरितमानस के वर्णन से स्पष्ट होता है कि शबरी उसी श्रेणी में थी। वह भगवान के लिए रास्ते में रोज फूल बिछाती थी। उसके गुरुभाई और समकालीन संत उसे पगली कहते थे जबकि उसे लगता था कि भगवान अभी आ ही रहे हैं। एक दिन भगवान उसी रास्ते से आये भी! भगवान रास्ता बदलकर सीधा शबरी के पास पहुँचे, दर्शन दिया। शबरी ने अपना परिचय दिया–
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। (मानस, ३/३४/३)
एक तो अधम कोल-किरात, उससे भी अधम मैं नारी हूँ। उससे भी अधम मैं बुद्धि की मन्द हूँ। भगवान राम ने कहा–
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता।। (मानस, ३/३४/४)
हे भामिनि! मैं केवल भक्ति का रिश्ता जानता हूँ। भक्ति के नौ अंग हैं। उनमें से एक भी जिसके पास होता है वह मेरा परमप्रिय होता है; और ‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।’ (मानस, ३/३५/७) इसलिए तुम मेरे धाम जाओ। शबरी धाम चली गयी। शबरी भगवद्प्रेम में इतनी दीवानी थी कि लोगों ने उसे पगली छोड़ कुछ कहा ही नहीं। भगवान ने उसे दर्शन दिया, अपने धाम भेज दिया। जंगलभर के ऋषि-महर्षि उस धूलि को शिर पर चढ़ाने लगे जहाँ वह परमधाम को गयी। वह गीता पढ़ी नहीं थी। थी एकदम अँगूठा छाप।
महर्षि बाल्मीकि के भी पढ़ने-लिखने का इतिवृत्त नहीं मिलता। कहा जाता है कि भगवान राम बाद में जन्मे, रामायण उन्होंने पहले ही लिख दिया। उनका स्वरूप बोलता था, आकाश बोलता था। उनके हृदय में प्रकट हो गया कि भविष्य में क्या होनेवाला है। सब अनुभव में उतर आया। अस्तु, ईश्वर-पथ में आप विद्वान् हैं तो बने रहें, भगवत्पथ में उसका बहुत उपयोग नहीं है। यदि आप पढ़े-लिखे नहीं हैं तब भी कोई क्षति नहीं है। वहाँ तो केवल प्रेम चाहिए। पथिक को प्रभु के विरह में खोया हुआ होना चाहिए, दीवाना होना चाहिए।
जड़भरत राजकुल से थे। पुत्र को राजपाट सौंपकर सन्त हो गये। सन्त भी ऐसे कि शनै:-शनै: शरीर से वस्त्र उतरते गये। एक वृक्ष के नीचे हाथ का सिरहाना लगाकर पागलों की तरह पड़े रहते थे – सदैव चिन्तन में अनुरक्त!
रामचरितमानस में है कि भगवान राम के अनुज भरत उनकी खड़ाऊँ लेकर चित्रकूट से नन्दीग्राम आये और चिन्तन में डूब गये–
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई।
घटइ तेज बलु मुख छबि सोई।।
नित नव राम प्रेम पनु पीना।
बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।। (मानस, २/३२४/१-२)
खान-पान से बढ़नेवाला शरीरबल हल्का हो रहा था; किन्तु ‘बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।’– धर्म का दल बढ़ रहा था, उनकी मानसिक प्रसन्नता वही थी। चौदह वर्ष पश्चात् हनुमान ने भरत को उसी स्थिति में पाया–
बैठे देखि कुसासन, जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत, स्रवत नयन जलजात।। (मानस, ७/१ ख)
भरत की आँखों में आँसू और हृदय में स्वरूप था।
देखत हनूमान अति हरषेउ।
पुलक गात लोचन जल बरषेउ।। (मानस, ७/१/१)
हनुमान को रोमाञ्च हो आया, प्रेमाश्रु छलक आये–
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी।
बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।
जासु बिरह सोचहु दिन राती।
रटहु निरंतर गुन गन पाँती।। (मानस, ७/१/२-३)
जिसके विरह में आप दिन-रात रहते हो, जिनके गुणों की पंक्ति को रटते ही रहते हो, शत्रु को जीतकर वही प्रभु राम आ गये। जहाँ इतना सुना कि सीता और अनुज सहित प्रभु राम आ गये, भरत का सारा दु:ख दूर हो गया–
सुनत बचन बिसरे सब दूखा।
तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।। (मानस, ७/१/६)
जैसे जल का प्यासा अमृत पा गया हो। भरत इसी कोटि के दीवाने थे। चौदह वर्ष पूर्व जो दशा थी, चौदह वर्ष पश्चात् हनुमान ने भरत को उसी दशा में पाया। लेकिन जब भगवान मिल गये, उसके पश्चात् भरत ने पुन: कभी आँख नहीं मूँदा, फिर कभी नन्दीग्राम में नहीं गये। वे मुकुट पहनकर मस्ती में रहे– ‘जब उतरि पुतरि भये पारा। तब सदगुरु कौन हमारा।।’ अब तो ‘भजन हमार हरि करें, हम पायो विश्राम।’ पेन्शनीयर हो गये।
मीरा दीवानी थी– ‘हे री, मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय।’ आशय यह है कि भगवान के प्रेमी भक्त, अंतरंग भक्त, विरही भक्त जिस-जिस रास्ते से, जिस चाल से चले गये उसी देश में तुम भी चलो तो अलख, अगोचर और अचिन्त्य जो परमात्मा है, उसका संग पा जाओगे और उसमें स्थिति भी प्राप्त कर लोगे।
विश्व में सन्तवेष में तो करोड़ों हुए; किन्तु उनमें से यदि किसी का कीर्तिमान् मिला है तो उन दीवानों का मिला। जैसे रामकृष्ण परमहंस जिन्हें उनके जीवन के पूर्वार्द्ध तक लोगों ने पागल समझा; किन्तु वह पागल नहीं थे, भगवान के चिन्तन में डूबे हुए सन्त थे। उनके आशीर्वाद से स्वामी विवेकानन्द इत्यादि कई सन्त हुए। उन महापुरुष की जो वाणी थी, उसे उन्होंने प्रस्तुत कर दिया।
आज भी जिन्हें परमात्मा की आवश्यकता है, उस पथ पर अवश्य चलेंगे; किन्तु उस देश में जाने का रास्ता कौन बतायेगा? इस पर कहते हैं–
संत सदा उपदेश बतावें, घट अन्दर दीदार करावें।
ईश्वर-पथ में जाने का रास्ता सदैव सन्तों से मिला है, ऐसा उपदेश संत करेंगे। जड़भरत ने राजा रहूगण से कहा– राजन्! किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के चरणों की धूलि में लोटे बिना वह साधना जागृत ही नहीं होती, एक परमात्मा के पथ में चलने की विधि का आरम्भ ही नहीं होता। ईश्वर के रास्ते में कैसे चलें?– यह रास्ता अनादिकाल से सन्त ही बताते चले आये हैं। उन सन्तों के उपदेश में भगवान काशी में नहीं रहते, अयोध्या में या बद्रीनाथ में नहीं रहते। उनके उपदेश का भगवान सदैव हृदय में रहता है– ‘घट अन्दर दीदार करावें’। वे केवल कहते नहीं कि भगवान हृदय में हैं। केवल कहने से क्या लाभ? वह उनका साक्षात् करा देता है, अत:–
तन मन अर्पण करिहौ, तुम चलो दिवाने देस।
सन्तों के पास आप फल-फूल लेकर जाते हैं, श्रद्धा निवेदित करते हैं, यह उचित है; किन्तु यदि आप सचमुच साधना में प्रवृत्त होना चाहते हैं तो तन लेकर जाओ, मन लेकर जाओ, उन्हें अर्पित कर दो, गुरु के हाथ का यंत्र हो जाओ। जैसे– यह पात्र हमारे हाथ में है अब इसमें हम चाहें तो चाय भर दें या इसे उठाकर फेंक दें, इसे कोई आपत्ति नहीं होगी। पत्र-पुष्प या कोई वस्तु आपने हमें अर्पित कर दिया तो यह हमारी हो गयी या अभी आपकी है? अस्तु, तन और मन आपने अर्पित कर दिया तो यह उनका हो गया। इसके पश्चात् हमारी बुद्धि मात्र यंत्र है। सद्गुरु जैसी प्रेरणा करें, हमें बस उतना ही करना है।
तन-मन का अर्पण करनेवालों में राजा जनक का नाम अग्रगण्य है। एक बार उन्होंने स्वप्न देखा कि वह फुटपाथ पर भीख माँग रहे हैं। दिनभर भीख माँगा, फिर भी शाम को पेट नहीं भरा। आधा पेट खाकर वह फुटपाथ की धूलि और गर्दे में ही सो गये। आँख खुलने पर उन्होंने अपने को राजमहल में ही पाया। उन्हें चिन्ता हो आयी– कहीं यह स्वप्न सत्य न हो जाय! किसी निश्चय पर न पहुँच पाने से उन्होंने विद्वानों की गोष्ठी बुलाकर पूछा– मैं जो कर रहा हूँ वह सत्य है, या जो देखा है? अब किसे क्या मालूम कि यह क्या कर रहे हैं और इन्होंने क्या देखा? कतिपय विद्वानों ने अनुमान के आधार पर उपदेश देना चाहा। जनक को उन सबसे बड़ी निराशा हुई। उन्होंने कहा– ये हमारे राष्ट्र के ही नहीं, पृथ्वी के भार हैं; इतनी सी बात ये नहीं बता पाये। इन्हें कारागृह में डाल दो। वे सब लगे जेल में चक्की पीसने। उन दिनों अनाज पीसने के कल-कारखाने न थे। फौ़ज का भरण-पोषण कैदियों द्वारा चक्की चलाने से होता था, इसलिए कैदियों को इस कार्य में नियुक्त किया जाता था।
विद्वानों के पश्चात् ऋषियों, महर्षियों का भी क्रम आया। अष्टावक्र के गुरु कहोड़ ऋषि भी जेल में डाल दिये गये। छ: महीने पश्चात् अष्टावक्र जंगल से अपने आश्रम पर आये। उन्होंने पूछा– गुरुदेव कहाँ हैं? अन्तेवासियों ने बताया– छ: माह पहले जनक की सभा में शास्त्रार्थ करने गये थे। तब से वह नहीं लौटे।
अष्टावक्र सीधे राजमहल पहुँचे। द्वारपाल ने राजा को सूचित किया कि उनके प्रश्न का उत्तर देने कोई महात्मा पधारे हैं। जनक बहुत प्रसन्न हुए कि छ: महीने का सन्नाटा तो टूटा। किसी ने मेरे प्रश्न का उत्तर देने का साहस तो किया। सभासद भी राजा के साथ चले आये। अष्टावक्र के रूप-रंग और चाल-ढाल को देख राजा को हँसी आ गयी। जब महाराजा ही हँस पड़े तो सभासदों को हँसना ही था। कुछ तो सचमुच हँसे और अधिकांश राजा की हाँ में हाँ मिलाने के लिए केवल औपचारिकतावश हँसे। बड़े आदमी हँसते हैं तो संग साथ के लोगों को भी हँसना पड़ जाता है। जब सबकी हँसी रुकी तो अष्टावक्र लगे अकेले ही खूब हँसने।
राजा ने समझ लिया– यह है तो पागल! अकारण ही हँसे जा रहा है। फिर भी उन्होंने पूछ लिया– महात्मन्! आप हँसे क्यों? अष्टावक्र ने कहा– राजन्! पहले तुम और तुम्हारे सभासद हँसे इसलिए पहले तुमलोग अपने हँसने का कारण बताओ, तत्पश्चात् मैं भी अपने हँसने का कारण स्पष्ट कर दूँगा। राजा ने कहा– महाराज! क्षमा कीजिएगा। आपसे पहले यहाँ एक से एक मोटे-ताजे, सुगठित शरीरवाले धुरन्धर विद्वान् मोटी-मोटी पोथियाँ लेकर आये, वह सब यहाँ जेल में चक्की पीस रहे हैं। उनकी तुलना में आपका ठिगना शरीर, टेढ़े-मेढ़े हाथ-पाँव, कई जगह से मुड़ा हुआ शरीर, आँखें पीछे की ओर उलट गयी हैं, दाँत खुरपी की तरह! आप चलते हैं तो शरीर में कई जगह लहर पैदा हो जा रही है। आपकी चमड़ी का आकार देख हमलोगों को हँसी आ गयी।
अष्टावक्र ने कहा– राजन्! हमने सुन रखा था कि जनक की सभा ज्ञानीजनों की, विज्ञपुरुषों की सभा है लेकिन हमें देखने को कुछ और ही मिला कि आपकी यह सभा चमारों की सभा है; क्योंकि आप सब चमड़ी की पहचान बहुत बढ़िया कर लेते हैं। यह मानव-शरीर एक दुर्लभ तन है–
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। (मानस, ७/४२/७-८)
बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है। यह देवताओं को भी दुर्लभ है। देवता भी इस तन से आशावान् हैं। यह साधन का धाम है। यह नहीं कि कौन-सा साधन करके आये हैं। उत्तर प्रदेश में कहते हैं कि साधन अर्थात् बस-टैम्पो से आया और अपनी सवारी से आने पर कहेंगे कि गाड़ी से आया हूँ। बाँदा जिले में आटा-भाँटा जुटाने को कहते हैं कि साधन जुटा रहा हूँ। ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ साधन वह है जो मोक्ष प्रदान कर दे। उसके लिए विवेक, वैराग्य, शम, दम, श्रद्धा, समर्पण जो भी ईश्वर-प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं, उस सम्पूर्ण साधन के लिए उपयुक्त शरीर सजा-सँवारकर भगवान ने भेजा है। दुर्लभ मानव-तन को भगवान ने जिस कमी की पूर्ति के लिए दिया है, राजन्! मैं उसी कार्य में प्रवृत्त हूँ। शरीर तो एक वस्त्र है। क्या इसमें निवास करनेवाली आत्मा के दाँत खुरपी की तरह हैं? क्या उसकी आँखें उलट गयी हैं? क्या उसके हाथ-पाँव उलटे-सीधे हैं? जो सर्वत्र देखता है, सर्वत्र सुनता है, सर्वत्र कार्य करता और सर्वत्र गतिशील है, क्या हमारे उस आत्मा में भी कोई कमी है? हमें इसीलिए हँसी आ गयी, राजन्!
जनक ने सोचा– यह महात्मा तो बहुत आगे हैं, सचमुच के महात्मा लगते हैं। उन्होंने कहा– भगवन्! मेरे प्रश्न का उत्तर? ऋषि ने कहा– राजन्! पहले कुछ दान-पुण्य करें, फिर उत्तर ले लें। राजा ने कहा– मंत्रीप्रवर! इन महाराज को पचास हजार गाय दान कर दो। ऋषि बोले– गाय नहीं, तुम अपनी कोई निजी वस्तु दान कर दो। राजा ने कहा– इन्हें आधा राज्य दे दो। अष्टावक्र ने कहा– कभी राज्य देता है तो कभी गाय! अपनी कोई वस्तु क्यों नहीं देते?
सभासद मुस्कराने लगे। उन्होंने सोचा– यह बाबा जंगली प्रतीत होता है। इसे पता नहीं कि महाराजाधिराज किसे कहते हैं! एक ने कहा– महात्मन्! यह मालिक हैं। सब इन्हीं का है। ऋषि ने कहा– तुमलोग चुप रहो। इनसे पहले इस राज्य के राजा कौन थे? सभासद ने कहा– इनके पिता यहाँ के यशस्वी नरेश रहे हैं। अष्टावक्र ने पूछा– और उनसे पहले? सभासद जनक राजा के सात-आठ पीढ़ियों को गिना ले गया। ऋषि बोले– इन महाराज के पश्चात् इनके सिंहासन पर कौन विराजेगा? सभासद ने कहा– अभी तो कोई सन्तान नहीं है। यदि होगी तो वह गद्दी पर बैठेगा अन्यथा जैसी हरि की इच्छा। अष्टावक्र ने कहा– जिसके दावेदार आते गये, चलते गये – यह राज्य जब उन्हीं का था तो इसे वे अपने साथ लेकर क्यों नहीं गये? इनकी भी घड़ी टल रही है। इन्हें भी सब यहीं छोड़कर जाना होगा। इसीलिए मैं कहता हूँ कि यह कोई अपनी वस्तु दें।
तब जनक ने हाथ जोड़कर प्रार्थना किया– भगवन्! मेरे पास अपना क्या है, आप ही बतायें। अष्टावक्र ने कहा– राजन्! अपना मन दान कर दो। राजा ने जल लेकर तत्काल संकल्प कर दिया। अष्टावक्र ने उसे स्वीकार किया और थोड़ी दूर जाकर एक आसन पर बैठकर ध्यानस्थ हो गये।
जनक लगभग एक घड़ी (२४ मिनट) तो खड़े रहे। उन्हें क्रोध आने लगा। उन्होंने सोचा– औरों को तो मैंने कारागार में बन्द किया है, इन्हें तो फाँसी दूँगा। देखो न, हमनें इन्हें मुँहमाँगा दान दिया फिर भी इन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर अभी तक नहीं दिया, बैठने तक को नहीं कहा। मैं समझ रहा था कि आँख बन्दकर यह मेरे प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ रहे हैं; किन्तु अब तो बहुत देर हो गयी।
इतने में जनक के हृदय में प्रेरणा हुई– जब मन का दान दे दिया तो यह योजना कौन बना रहा है? यह फाँसी कौन दे रहा है? लगता है हमने केवल संकल्प किया है, मन इन्हें दिया नहीं। वह अष्टावक्र के स्वरूप की ओर देखने लगे। देखते-देखते जनक ध्यानस्थ हो गये। सायं होते-होते ध्यान जम गया। ध्यान की उस प्रगाढ़ अवस्था में जनक के हृदय में प्रेरणा हुई– देख! जो रोज करता है, राजपाट नश्वर है और जो फुटपाथ दिखायी पड़ा, वह भी नश्वर है। यह सिंहासन पर बैठना और भिक्षाटन– दोनों ही जन्म और मृत्यु के बीच के पड़ाव हैं। कोई सिंहासन पर बैठकर जीवन के दिन पूरे करता है तो कोई फुटपाथ पर जीवन काट लेता है। दोनों में कोई भी सत्य नहीं है। इस समय जो ध्यान-चिन्तन कर रहे हो, यही सत्य है। थोड़ा परिश्रम और करो, तुम अपने स्वरूप को प्राप्त कर लोगे; जहाँ जन्म नहीं है, मृत्यु नहीं है। तुम सदा रहनेवाली शान्ति, सदा रहनेवाला जीवन और धाम पा जाओगे। इसके लिए प्रयत्न करो।
उनके उपदेश का अनुपालन कर जनक राजर्षि हो गये। महर्षियों के यहाँ जब कोई प्रश्न उलझ जाता था, वे समाधान के लिए अपने शिष्यों को जनक के यहाँ भेजते रहते थे। अस्तु, महापुरुषों के यहाँ मन का दान होता है। किन्तु मन का दान इतना ही आसान होता तो हर कोई तुरन्त कर देता। जनक ने भी आरम्भ में मन का दान ही तो किया था फिर भी वह लगे फाँसी देने। कहने को तो मन का समर्पण गुरु को उसी दिन किया जाता है जिस दिन शिष्य शरण ग्रहण करता है किन्तु पूर्ण समर्पण तो अभ्यास करते-करते ध्यान की स्थिति आ जाने पर ही होता है। जनक ने इस प्रकार का समर्पण किया और पा भी गये। सन्तों के उपदेश, शरण-सेवा-सान्निध्य से भजन जागृत हो गया। वह जागृति कैसे होती है?
शब्द विहंगम बाजे तूरा। कोटि भाँति जहँ भभके नूरा।
भजन की जागृति शब्द से होती है। जिस परमात्मा की हमें चाह है, हमारी पुकार ऐसी हो कि जिस सतह पर हम हैं, प्रभु उतरकर वहीं आ जायँ, हृदय से अपनी वाणी, शब्द देने लगे। विहंग पक्षी को कहते हैं। वह आकाशचारी होता है। आकाश का शब्द जब उतरने लगे, यही है ‘शब्द विहंगम’! यह ‘बाजे तूरा’– तूर्य की तरह, राजा–महाराजाओं के यहाँ बजती रहनेवाली तुरही की तरह बहुत देर तक एक ही धुन से बजती रहती है। एक बार शब्द जागृत हो गया, उस परमात्मा की अपौरुषेय वाणी उतर चली, फिर वह अविरल बजती ही रहती है, जब तक पार नहीं हो जायँगे, दर्शन-स्पर्श और स्थिति नहीं पा लेंगे, तब तक यह बीच में विराम नहीं लेती। उस शब्द के निर्देशन में भगवान का स्वरूप झलकने लगता है– ‘कोटि भाँति जहँ भभके नूरा’– आपका स्वरूप तो बाद में मिलता है, उसके पहले करोड़ों विधियों से भगवान का, इष्ट का स्वरूप झलकने लगता है, प्रकट होने लगता है। ऐसी अवस्था में साधक को क्या करना चाहिए?–
बंकनाल सुधि करिहौ।
बंकनाल श्वास का नाम है। यह श्वास नासिका से मस्तिष्क में होते मेरुदण्ड से गुदाचक्र होकर नाभि और कण्ठ का स्पर्श करते नासिका से पुन: निकल जाती है–हठयोग में ऐसी मान्यता है। यह रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है इसलिए श्वास को बंकनाल कहते हैं। अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को समेटकर सुध अर्थात् स्मृति के साथ श्वास में लगाओ। श्वास का ध्यान करो। नाम के अतिरिक्त अन्य संकल्प न आयें। पूज्य गुरुदेव कहते थे– जो श्वास का भजन नहीं जानते, ऐसे साधुओं को महापुरुष अपनी कुटिया में दो रोटी भी नहीं देते थे। उनका मानना था कि यह स्वयं तो पथभ्रष्ट है ही, घूम-घूमकर दूसरों को गुमराह ही तो करेगा। इसलिए श्वास के ऊपर सुरत लगाओ, केवल उसकी सुधि करो।
श्वास-प्रश्वास का यजन करते-करते इसकी परिपक्व अवस्था में एक ऐसा स्तर आता है कि ‘सुखमन सेज विहंगम सीढ़ी’– मन सुखपूर्वक स्वाँस में प्रवाहित हो जाता है। मन भजन में सुख मानने लगता है। एक बार सुध करो तो सुरत सुखपूर्वक एकदम शान्त, ओम्-ओम्-ओम्-ओम् की धुन प्रवाहित हो गयी। अब मन इधर-उधर भागता ही नहीं। सोया आदमी क्या भागेगा! इसी प्रकार मन सो जाता है, मन शय्या यानी सेज पा जाता है लेकिन रास्ता वही ‘विहंगम सीढ़ी’– आकाश वाले शब्द का ही सहारा है। उसी के निर्देशन में समझ में आता है कि मन कितने प्रतिशत शान्त प्रवाहित हुआ। शान्त मन की यह बड़ी अच्छी अवस्था है, फिर भी ‘माया गस्त करे चहुँ फेरी।’– इस धोखे में मत रहना कि हमारी अवस्था बहुत अच्छी है। अभी चारों ओर से माया ने बहुत कड़ा पहरा लगा रखा है। वह छिद्रान्वेषण करने में लगी है। अभी आप माया के ही क्षेत्र में हैं, तनिक सी असावधानी से माया अभी कामयाब हो सकती है।
अरब में एक अच्छे महापुरुष हुए। दस वर्ष की आयु से ही वह साधु हो गये। वह नियम, संयम और ईश्वर-चिन्तन में ही निमग्न रहते थे। उनकी आधी उम्र तक तो लोगों ने उन्हें पागल समझा। शान्त जंगल-झाड़ियों में उनका निवास था। पुण्यात्माओं के हृदय में प्रेरणा द्वारा उनके खाने-पीने की व्यवस्था हो जाती थी। धीरे-धीरे उनकी आयु पचहत्तर वर्ष की हो गयी। अब उनके परीक्षा की घड़ी आयी।
झाड़ियों के समीप की पगडंडी से क्षेत्रीय वनवासी आया-जाया करते थे। एक दिन एक शहजादी जंगल में दृष्टिगोचर हुई। उसकी वेषभूषा, चाल-ढाल और बढ़िया सलोना स्वरूप बाबा ने देखा। ग्रामीण जंगली लोग उस मार्ग से आते ही जाते, इधर-उधर निकलते ही रहते थे। उन महात्मा ने जीवन में कभी उनसे बात ही नहीं किया; किन्तु इस सलोने स्वरूप को देखा तो उन्हें दया आ गयी। अरे! इस जंगल में यह अकेली! उन्होंने पूछ लिया– क्यों, तुम्हारे साथ कोई है? वह मुस्कराकर थोड़ा पीछे हट गयी।
महात्मा ने कहा– देख इधर घनघोर रेगिस्तान है, जंगल झाड़ी है, इधर भटक जायेगी तो कहीं पानी नहीं है। जंगली नरभक्षी जानवर भी यहाँ हैं। बताओ, तुम्हें जाना कहाँ है तो मैं रास्ता बता दूँ। किन्तु वह मुस्कराकर पीछे हटती गयी। बाबा खड़े हो गये। उन्होंने सोचा– यह जरूर धोखा खा जायेगी। यह रास्ता भटक गयी है, उद्दण्ड की तरह दौड़ रही है। लगता है शहर की है। वह आगे-आगे चलने लगी, पीछे-पीछे वह बाबाजी! वह थोड़ा दौड़ने लगी तो बाबा भी दौड़ पड़े। अब कहाँ वह कल की लड़की, फर-फर उड़ रही थी; और कहाँ पचहत्तर वर्ष के महात्मा! वह हाँफते हुए खड़े हो गये, बोले– अब मरे चाहे जिये! यह जाने और इसका भाग्य। बाबा ज्योंही हताश होकर खड़े हुए, आकाशवाणी हुई– ‘जो आजीवन बड़े वेग से जन्नत की ओर जा रहा था, आज वही उतने ही वेग से दो़जख की ओर भागा जा रहा है। अरे, आज से चौथे दिन तुम्हें नबूवत (अवतार की स्थिति) मिलनेवाली थी, लेकिन तुम चूक गये।
उन महात्मा ने कुल्हाड़ी से अपना पाँव काट डाला। उन्होंने कहा– दोष इन पाँवों का है। जबकि पाँवों का कोई दोष ही नहीं था। पाँव को आदेश दिया था मन ने।
दया बिन सन्त कसाई। दया करी तो आफत आई।।
वस्तुत: उन महात्मा के मन में हवा भर भी गलत विचार नहीं था, उन्होंने दयावश ऐसा किया था; किन्तु आकाशवाणी ने बताया– दो़जख की ओर जा रहे हो। क्यों? आप आज की जानते हैं कि हमारे मन में कोई गन्दा विचार नहीं है; किन्तु साथ उठने-बैठने के पश्चात् क्या भाव प्रकट होगा, यह भगवान जानते हैं। अस्तु, अच्छे महात्माओं को भी सदा सतर्क रहना चाहिए। अंतत: कबीर कहते हैं–
इस पद का जो अर्थ बिचारे, कह कबीर वे दास हमारे।
इस पद में बतायी हुई अवस्थाएँ अपने में जो विचार ले ‘कह कबीर वे दास हमारे’– कबीर कहते हैं– वे मेरा अनुगमन करनेवाले हैं, शिष्य हैं। मान लें, वह तो शिष्य हो गये और भी किसी को प्रवेश है या नहीं? इस पर कहते हैं– ‘कोई नाम का व्यवहारी मिलिहो’– सृष्टि में कोई भी हो, कोई नाम का प्रेमी मिल जाय, बस वह भी शिष्य है। ‘तुम चलो दिवाने देस’– केवल एक काम करना है कि परमात्मा के अंतरंग भक्त, विरही, दीवाने, मीरा और सुतीक्ष्ण-जैसी रहनीवाले जिस चाल से चले, जिस पथ से गुजरे, तुम भी उस पथ से गुजर चलो; अवश्य प्राप्त कर लोगे, दर्शन पा जाओगे और विलय भी प्राप्त कर लोगे।
इस रहनी-गहनी को कोई भी अपना सकता है, केवल–
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
सोते-जागते, चलते-फिरते, उठते-बैठते, खुरपी चलाते, जीवन के हर मोड़ पर नाम याद आया करे। श्रद्धा और समर्पण के साथ नाम का स्मरण – यही है नाम का व्यवहार। सुबह-शाम जितना हो सके, उतना समय नियमित दिया करें। बच्चे समय दें, मातायें दें, युवक दें – सब दें। यह नियम खण्डित न हो।
भगवान के स्मरण के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि अभी हमने स्नान नहीं किया या मुख नहीं धोया। इसकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुमिरन अन्त:करण से होता है। चमड़ी धोने या न धोने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। हमारे गुरु महाराज साल-छ: महीनों तक स्नान ही नहीं करते थे। उनकी मान्यता थी कि नहाने-धोने में जो समय नष्ट होता है उसे हम भजन में क्यों न लगावें। अस्तु,
जीवन के हर मोड़ पर हर परिस्थिति में, समर्पण के साथ एक परमात्मा का जो बोध कराता है ऐसे एक नाम ओम् अथवा राम का जप करो। उस भजन की जागृति सद्गुरु से होती है। जब खूब जप करोगे तो भगवान गुरु भी ढूँढ़ कर दे देंगे। पहले तो समझ में ही नहीं आता है कि कौन गुरु है और कौन चेला? भगवान जब अनुग्रह करते हैं तभी समझ में आता है–
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेहीं।
राम कृपा करि चितवा जेहीं।। (मानस, ७/६८/७)
और गुरु के मिलते ही ‘सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।’ (मानस, ४/१७)– संशय और भ्रम का समूल नाश हो जाता है। फिर कभी सन्देह नहीं होगा कि रास्ता यह सही है या वह सही है! फिर यह ईश्वर-पथ दिग्दर्शन कराकर ही शान्त होता है।
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)