भगवान बुद्ध की दृष्टि में ‘अहिंसा’
अहिंसा यौगिक शब्द है। जब साधक शान्त-एकान्त में भजन-चिन्तन में बैठते हैं, उनके अन्त:करण में आनेवाली एक अवस्था का नाम अहिंसा है। यह…
प्रश्न- महाराजजी! भगवत्-पथ में इतने सम्प्रदाय क्यों हैं? कुछ लोग साम्प्रदायिक भेद से विरोध क्यों करने लगते हैं?
उत्तर- महाराजजी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि भगवत्-पथ में कोई सम्प्रदाय…
ब्रह्मचर्य
मन से विषयों का चिन्तन न करते हुए एक परमात्मा का निरन्तर चिन्तन ही ब्रह्मचर्य का आचरण है। - स्वामी अड़गड़ानन्द
ब्रह्मचर्य के नाम पर संसार में बहुत बड़ी…
प्रश्न- महाराजजी! तीर्थयात्रा में जानेवाला हूँ परन्तु आपकी वाणी से विदित हुआ कि तीर्थ की योग्यता अन्दर में अधिक पायी जाती है। कृपा करके बतावें कि बाह्य तीर्थों का क्या…
राम और कृष्ण - मर्यादा के दृष्टिकोण
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे।
जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। (मानस, 2/126/7)
यतिचक्र चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा विरचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार आदिकवि बाल्मिकी…
सन्ध्याकालीन वन्दना के पश्चात् साधकों एवं भाविकों के बीच प्रणाम का महत्त्व बताते हुए श्री परमहंसजी
पूज्य महाराजजी साधकों के मनोगत भावों को पकड़कर तदनुकूल उपदेश दिया करते थे और…
पुनर्जन्म
दीपावली, दिनांक 17 अक्टूबर सन् 2009 को श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ की सायंकालीन सभा में भक्तों की जिज्ञासा पर कि ‘‘मृत्यु के पश्चात् क्या जीवात्मा का पुनर्जन्म होता है?’’…
पाप और पुण्य
जो जन्म-मरण का कारण है वह पापकर्म है और जो उससे उद्धार कर शाश्वत परमधाम दिला देता है वह पुण्यकर्म है। - स्वामी अड़गड़ानन्द
महाकुम्भ पर्व पर…
प्रश्न- कुछ विद्वानों ने आकर प्रश्न किया कि, महाराजजी! परहित क्या है? लोकहितार्थ आपकी वाणी जनसमूह तक पहुँचनी चाहिए।
उत्तर- श्री परमहंस महाराजजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि यह…
प्रश्न - परमात्मा ही सत्य है तब देव-पूजा क्या है?
उत्तर :- गीता में भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट आश्वासन है कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। स्वल्प अभ्यास भी…